Bhookh | भूख

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बीप…बीप… एलार्म बज उठा। सुबह के पाँच बज रहे थे। यश बड़े भारी मन से उठ कर रसोईघर में गया। रसोईघर से जब वापस आया तो उसके हाथ में एक चाय की प्याली थी। यश सोफे पर बैठ कर चाय पीते हुए-

ओह्…. आज रात तो मैं ठीक से सो ही नहीं पाया। पूरी रात “मिस उर्वशी” के बारे में ही सोचता रहा कि कब आँख लग गई पता ही नहीं चला। चलो अच्छा है आज रविवार हैं। पूरे दिन आज आराम करूँगा। यश अपने आप से कहते हुए फिर बिस्तर पर लेट जाता है। किन्तु ख्वाब कब मानते है बिना आये। वो तो जब चाहे,जहाँ चाहे, जैसे चाहे चले आते है। वही हाल यश के साथ था।

उसे अच्छी तरह याद है जब दिल्ली में उसकी नई नई नौकरी लगी थी तो पहले दिन ऑफिस में यश उसे देखता ही रह गया था मानों कोई अप्सरा धरती पर उतर आई हो –  गोल चेहरा.. गोरा रंग…कमान सी तनी हुई पतली काली भौंहें… मृग नैनी झील जैसी आँखें… गुलाब पंखुड़ियों जैसे होंठ… सुराही दार गर्दन… सुडौल वक्ष…. पतली कमर… ऊपर से मस्तानी चाल। ऐसी अप्सरा पर कौन न मरता.. पूरे ऑफिस के मर्द उसकी एक झलक पाने के लिए पागल रहते। केवल ये कहना गलत होगा कि मर्द ही उसे देखने के लिए पागल रहते थे बल्कि औरतें भी कोई कम न थी। जिधर से वो गुजर जाए उधर की चहल कदमी रुक जाए। ऐसे में मेरा क्या हाल हुआ होगा ये कहना मुश्किल था।

गजब के इसी आकर्षण ने सभी को पागल बना रखा था। यश उसे देखा ही जा रहा था कि अचानक-

“हैलो…….”- उर्वशी चुटकी बजाते हुए।

हड़बड़ा कर अपनी पलकें झपकते हुए-



“जी…..”

“ई एम उर्वशी”- उर्वशी ने हाथ आगे बढ़ाते हुए।

“जैसा नाम वैसा रूप…. उफ्फ….”- यश के मुँह से अनयास ही निकल गया।

“क्या कहा आपने…?”-अंजान बनकर खिलखिला कर उर्वशी हँसते हुए।

“कुछ नहीं…. कुछ नहीं…”- यश अपने आप को संभालते हुए।

“ई एम यश”- यश हाथ मिलाते हुए।

“इस ऑफिस में मेरा पहला दिन है”- यश ने कहा।

इतने में बॉस ऑफिस में आते के साथ उर्वशी को आवाज लगा कर अपने केबिन में बुलाते हुए-

“उर्वशी….”

“अच्छा मैं चलती हूँ…”- कहते हुए उर्वशी अपने बॉस के केबिन में चली गई।

सभी लोग अपनी-अपनी सीट पर बैठ गए। किन्तु यश को अन्दर से उर्वशी का बॉस के केबिन में जाना गवारा न लगा। पता नहीं क्यों?

आज तक यश ने इतनी बेवाक लड़की कभी नहीं देखी थी। क्या शोख- चंचल अदाएं थी…उसकी हँसी की खनक से यश का दिल बैठा जा रहा था। फिर पता चला कि उर्वशी बॉस की इकलौती बेटी थी। विदेश में बॉस का बहुत लम्बा चौड़ा कारोबार था। उसी सिलसिले में बॉस को यहाँ का कारोबार बेटी को सौंप कर वहाँ एक- दो दिन में ही जाना था। जब यश को इन बातों का पता चला तो मारे खुशी का ठिकाना न था कि अब उसे उर्वशी के नजदीक जाने का अच्छा खासा वक़्त मिलेगा।

उर्वशी स्वतंत्र मिजाज की लड़की थी। इसने इसी साल USA से MBA की डिग्री ली थी। वो शादी के बंधनों में बंधना नहीं चाहती थी इसलिए उसने निश्चय कर लिया था कि शादी के बिना ही वह स्वतंत्र रहकर जीवन का उपभोग करेगी। इसी वजह से उसके पुरुष मित्रों की कमी न थी। वो जब चाहती… जिसे चाहती… जैसे चाहती.. जिस समय चाहती…उसके पास बेरोक टोक के चली जाती। उर्वशी को शादी से नफरत नहीं थी। थी तो… उनके बन्धनों से, जो हरगिज नहीं चाहती थी। जब बिना शादी के बन्धन में बंधे भोग किया जा सकता था तो पराधीनता क्यूँ स्वीकार करें। भोग में उसे कोई नैतिक बाधा भी न थी। बाप की अथाह सम्पत्ति थी। रूप रंग में उसका कोई जोर नहीं… यौवन अपने चरमसीमा पर था तो फिर उर्वशी को कमी किसकी थी। जब स्वतन्त्र रहकर भोग विलास का आनन्द लिया जा सकता है तो आनन्द क्यूँ न ले।

दरअसल उर्वशी अपनी इस जिस्म की माँग को भूख समझती थी। जिस प्रकार लोग पेट की भूख मिटाने के लिए भोजन करते ह… कुछ लोग कुछ भी खाकर भूख मिटा लेते हैं तो कुछ लोग हर समय नए-नए व्यंजनों व स्वादिष्ट भोजन खाकर अपनी भूख शांत करते हैं उसी प्रकार उर्वशी भी अपने जिस्म की भूख को हमेशा शान्त करने के लिए नये चेहरों की तलाश रखती थी।

उर्वशी की कुछ समय के अन्तराल में ही यश से अच्छी-खासी दोस्ती हो गई थी दोनों को एक दूसरे के साथ रहना… घूमना फिरना व समय बिताना अच्छा लगता था।

काफी समय बीत जाने के बाद यश ने एक दिन उर्वशी के सामने शादी का प्रस्ताव रखा लेकिन यश को मालूम था कि उर्वशी इस प्रस्ताव को ठुकरा देगी क्योंकि यश को उसके बारे में सब कुछ मालूम था। हुआ भी वैसा ही, जैसा यश ने सोचा था। तत्पश्चात यश ने उर्वशी से कहा-

“उर्वशी….घर वाले मेरी शादी के लिए दबाव बना रहे हैं”- यश ने कहा।

“तो… तुम कर लो शादी…. मैं शादी पर विश्वास नहीं रखती”- उर्वशी ने कहा।

“सोच लो….मैं शादी के बंधनों को मानता हूँ”- यश ने कहा।

“तुम्हें किसने रोका…. किसी से भी तुम शादी कर सकते हो….”- उर्वशी बेवाक हो कर बोलते हुए।

“ठीक… है…”- यश भारी मन से।

कुछ महीनों में ही यश की शादी हो गई। शादी के बाद ही यश उर्वशी की नौकरी छोड़ कर मुम्बई चला गया। मुम्बई आते के साथ ही उसे एक अच्छी नौकरी मिल गई। अभी यश की नौकरी लगे छः आठ महीने ही बीते थे कि एक दिन अचानक उसने उर्वशी को अपने·  ऑफिस में देखा –

“उर्वशी यहाँ…. क्यों…? हो सकता है कि बॉस से जान पहचान हो…”- यश अपनी ही सोच में कंधे उचकाते हुए। कि-

“यश उठो शाम हो गई…..”- यश की पत्नी ने आवाज लगाते हुए।

हड़बड़ा कर यश घड़ी की तरफ देखा…घड़ी शाम की पाँच बजा रही थी। यश का माथा फटा जा रहा था। सर पर हाथ रखते हुए-

“सुनो…. एक गरमागरम चाय पिला दो। सर बहुत भारी हो रखा है… कल जल्दी ही ऑफिस निकलना पड़ेगा क्योंकि नये बॉस का वेलकम जो करना है…”- यश अपनी पत्नी से कहते हुए

अगली सुबह, यश ऑफिस पहुँचने के साथ ही नये बॉस का वेलकम जैसे ही करने गया कि-

“उर्वशी…..”- यश आश्चर्य के साथ ।तब उर्वशी से ही उसे पता चला कि इस ऑफिस को उसी के चक्कर में खरीदा गया है।

अब यश कर भी क्या सकता था? अपने केबिन में बैठते ही उर्वशी यश को अपने केबिन में बुलाते हुए-

“यश आज हमें साइट देखने चलना है’- उर्वशी ने कहा।

“मैडम…. आज मेरी तबीयत ठीक नहीं”- यश बहाना बनाते हुए।

“यश मुझे मालूम है कि तुम बहाना बना रहे हो… लेकिन आज कोई बहाना नहीं…ये बॉस का ऑर्डर है… तुम्हें मानना ही पड़ेगा…”- उर्वशी ने बुलंद आवाज में कहा।

अब यश को उर्वशी के साथ जाना तो… पड़ा ही…. किन्तु उर्वशी से कटा-कटा सा रहता। परन्तु उर्वशी का व्यवहार बिलकुल विपरीत था। जितना यश उर्वशी से दूर भागता वो उतना ही यश के नजदीक आने की सोचती। उर्वशी इस तरह के व्यवहार की किसी से अपने लिए अपेक्षा नहीं की थी तो यश से कैसे कर ले। उसके जीवन में बहुत से शादी शुदा भी मर्द आये थे फिर यश उसके लिए क्या था। अब उर्वशी को प्यार से ज्यादा यश को फिर से पाने की जिद्द हो गई थी। धीरे-धीरे उर्वशी का अन्य पुरुषों के प्रति आकर्षण कम व यश के प्रति बढ़ गया था। उर्वशी कई बार यश को रिझाने के लिए उसके सामने नए-नए प्रस्ताव रखती… कभी प्रमोशन का लालच.. तो कभी गाड़ी-बंगले का लालच…किन्तु यश था कि अपनी शादी शुदा ज़िन्दगी को तबाह नहीं करना चाहता था।

यूँ ही समय बीतता गया। देखते ही देखते उर्वशी का प्यार…. जिद्द में…व… जिद्द से पागलपन की सारी हदें कब पार कर गया ये उर्वशी को खुद ही पता नहीं चला।

एक दिन यश ने उर्वशी से कहा-

“उर्वशी…. देखो अब मैं शादी शुदा हूँ….हम दोनों शादी से पहले क्या किए उससे मुझे कोई मतलब नहीं किन्तु शादी के बाद अपनी पत्नी के प्रति वफादार रहना चाहता हूँ ताकि शादी का पवित्र बंधन बना रहे। इस रिश्ते को मैं किसी भी हाल में तोड़ना नहीं चाहता…”

“यश…मैं तुम्हें बहुत प्यार करती हूँ। मैं तुम्हारे बिना जी नहीं सकती। मैं अपनी सारी जायदाद तुम्हारे नाम लिख दूंगी…प्लीज्… बस उसे छोड़ कर…. मुझे अपना लो….”- उर्वशी ने भावुक होते हुए।

“उर्वशी… तुम समझती क्यों नहीं… मैं अब तुम्हें अपना नहीं सकता…तुम्हें कितनी बार कहूँ…”- यश वहाँ से जाते हुए उर्वशी से कहता है।

“मैं तुम्हें एक न एक दिन पाकर रहूँगी… चाहे मुझे उसके लिए कुछ भी करना पड़े…”- उर्वशी चीखते हुए।

इधर यश काफी परेशान हो गया। उसे उर्वशी को समझाने का कोई भी रास्ता सूझ नहीं रहा था। यही सोचते हुए सड़क पार करने लगा।

उधर उर्वशी अपने आपे से बाहर हो गई थी। वो दौड़ कर यश के कॉलर को पकड़ कर चीखते हुए–

“तुम अपने आप को समझते क्या हो….तुम्हारी बीवी…. मेरी पैरो की धूल भी नहीं है। तुम उसको देखो और मेरे को देखो… मेरे में क्या कमी है? मैं जवां हूँ….खूबसूरत हूँ…. धनवान हूँ….क्या नहीं है मेरे पास…. जो तुम मुझे ठुकरा रहे हो… और तुम्हारी बीवी में ऐसा क्या है जो मेरे में नहीं..?”

यश उसके प्रश्नों का जवाब देने ही जा रहा था कि इतने में धक्के के एहसास के साथ सड़क के किनारे वो गिर पड़ा जैसे ही पीछे मुड़ कर देखा….एक दम से चीख पड़ा-

“उर्व…शी.…”

ट्रक के धक्के से उर्वशी ऊपर की तरफ उछलती हुई सड़क पर आ गिरी। दौड़ कर यश उसके पास गया-

“उर्वशी ये तुमने क्या किया…?”- यश उर्वशी को गोद में उठते हुए।

“यश जब मैं तुमसे बात कर के लड़ रही थी तभी मेरी नजर तुम्हारे पीछे से आती ट्रक पर पड़ी। अगर मैं तुम्हें धक्का नहीं देती तो मेरी जगह तुम होते। जो कि…..मैं तुम्हें कुछ होते देख नहीं सकती”- उर्वशी ने उखड़ती साँसों के साथ कहा।

“उर्वशी… तुम्हें कुछ नहीं होगा… बस अभी अस्पताल पहुँच रहे हैं”- यश उर्वशी को हिम्मत बंधाते हुए।

अस्पताल पहुंचाते ही उर्वशी की गर्दन एक तरफ लुढ़क जाती है किन्तु उर्वशी की खुली आँखें यश को ऐसे घूर रही थी मानों कह रही हो…यश मैं ने कहा था न कि तुम्हें एक न एक दिन पा कर रहूँगी, चाहे मुझे उसके लिए कुछ भी करना पड़े और मेरे लिए तुम्हारा रोना ही तुम्हें पाने के बराबर है।

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