Amaanush | अमानुष

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कहानी पढ़ें:

धड़ा…म…से जमीन पर घड़ा गिरा और फूट गया। बुधिया मायूसी से बुध्दु (बुधिया का पति) को कहती है –

“लो रात को ही घड़ा फूटना था। अब पानी कहाँ से आवेगा…”

“रात भर बिना पानी के कैसे बीतेगा, मान लो हम लोग किसी तरह सो जावें किन्तु बच्ची ना मानेगी…”-   बुध्दु ने कहा

“देखते है…”- बुधिया ने कहा

बुधिया की मात्र दस साल की बेटी थी.. कोमल परंतु प्यार से सब कोमलिया कहते थे।

दरअसल.. बुध्दु दलित जाती से था। इनको गाँव के किसी भी कुएँ से पानी भरने नही दिया जाता। भरना तो दूर.. कुएँ के चबूतरे पर पाँव रखने तक की मनाही थी। किसी कारणवश कोई कुएँ से पानी भरता पकड़ा जाता तो हर्जाने के रूप में उनके शरीर पर कोड़े बरसाए जाते और साथ ही पैसो का जुर्माना भी भरना पड़ता.. सो अलग। इनपर दया भी कौन करता। जमींदारों व साहूकारों का राज था। जितने भी दलित वर्ग के लोग थे वो सभी नीच जाती के कहलाते। वे सभी गाँव से कोसों दूर जाकर नदी से पानी भरकर लाते इसके अलावा इनके पास पानी पीने का कोई साधन न था। अब होना भी क्या था? घड़ा फूट चुका था। अमावस्या की काली रात थी। रात के ठीक आठ बज चुके थे। कोमलिया पानी के लिए उठकर रोने लगी। बुधिया के समझाने पर कोमलिया मान भी गई जैसे कितनी बड़ी हो गई हो। शायद परिस्थितियाँ जल्दी ही बच्चों को बड़ा व समझदार बना देती है।



ज्यों-ज्यों समय बीतता जा रहा था कोमलिया का कण्ठ और सुखा जा रहा था। वो समझ रही थी की घर में पानी की एक बूंद भी नहीं है। फिर भी बार-बार कोमलिया नींद में होंठों को जीभ से गिला कर लेती थी। ऐसी स्थिति कोमलिया की देख बुधिया से रहा न गया। धीरे से एक लोटा लेकर पानी लेने निकल पड़ी। बुधिया का जी धक-धक किया जा रहा था। एक तरफ बेटी की प्यास व दूसरी तरफ जमींदारों का डर कि कहीं कोई देख न ले नहीं तो मारी जाऊँगी। ‘मरती क्या न करती’।

जमींदारों की हवेली के ठीक पास एक कुआँ था। जिसमें से केवल जमींदार ही पानी भरते थे। एक यही कुआँ बुधिया के पास पड़ता था बाकी सभी कुएँ बुधिया के घर से बहुत दूर-दूर पर थे इसलिए हिम्मत करके बुधिया इस कुएँ से पानी लेने चल दी। रात के नौ बजे थे। सभी लोग सो चुके थे। बुधिया दबे पाँव कुएँ के चबूतरे पर चढ़ी उसको ख़ुशी का ऐसा अनुभव पहले कभी न हुआ था। उसने धड़कते जी से एक बार फिर चारों तरफ दृष्टि घुमाकर देखी, कही कोई देख तो नहीं रहा। फिर इत्मीनान करने के बाद अपना कलेजा मजबूत करते हुए वही की रस्सी से बंधी बाल्टी कुएँ में धीरे से डाल दी। बाल्टी ने पानी में आहिस्ता से गोता लगाया। बुधिया बाल्टी एक गोते में जितना भर सकती थी उतनी भरी,उसके बाद बिना आवाज किए धीरे-धीरे रस्सी खींचने लगी। बाल्टी कुएँ के मुँह तक आ पहुँची। धीरे से आगे बढ़कर बुधिया ने कांपते हाथों से बाल्टी पकड़ी और लोटा भरकर एक लम्बी…ठण्डी सांस छोड़ी जैसे सारी दुनिया जीत ली हो। फिर भगवान का शुक्रिया अदा की, तभी बिजली चमकी बुधिया आसमान की तरफ देख ही रही थी कि कुएँ की तरफ किसी के आने की आहट हुई। झट से कुएँ से उतरकर पेड़ के पीछे जा छुपी। बुधिया की छाती जोर-जोर धड़कने लगी। बस अब यही सोच रही थी कि किसी तरह यहाँ से निकल जाऊँ, नहीं तो पकड़ी गई तो गजब हो जाएगा। थोड़ी देर इंतज़ार करने पर कुएँ की तरफ से आने वाली आहट बंद हो गई थी। बुधिया धीरे से पेड़ के पीछे से निकली ही थी कि पीछे से जमींदार पकड़ते हुए कहता है- “इतनी रात.. क्या कर रही थी यहाँ?”

“सरकार.. एक लोटा पानी लेने आई थी”- बुधिया ने धड़कते दिल से कहा

“हूँ… तू किसकी घरवाली है?”- जमींदार बुधिया से

“सरकार.. बुध्दु की..”- बुधिया ने कहा

“क्या… वो… नीच की…तेरी इतनी हिम्मत.. कि तुम लोग मेरे कुएँ से पानी भरो”- जमींदार गुस्से में

“सरकार… रात को घड़ा फूट गया… बच्ची प्यास से मरी जा रही थी नदी तो बहुत दूर थी इसलिए मजबूर होकर यहाँ पानी लेने आ गई।”- बुधिया ने गिड़गिड़ाते हुए

“तुझे मालूम नहीं? इस कुएँ से पानी लेना मना है… इसकी सजा तेरी गोरी-गोरी चमड़ी को उतारने के लिए ही काफी है”- जमींदार बुधिया के शरीर पर हाथ फेरते हुए। बुधिया केवल कल्पना मात्र से जमींदार की बातें सुनकर ऊपर से नीचे तक सिहर गई। बुधिया जमींदार के गलत इरादों को भाप चुकी थी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि इस समय जमींदार के चंगुल से कैसे बचा जाए। बुधिया इस प्रकार जमींदार के चंगुल में फंस चुकी थी जैसे किसी शेर के सामने उसका शिकार हो।

जमींदार की गलत हरकतें बढ़ती जा रही थी। बुधिया उसके गलत इरादे जान उससे तेज हो कर बोली-

“ये क्या कर रहें हों सरकार..”- अपने को जमींदार से छुड़वाते हुए।

“क्या कर रहा हूँ? ज्यादा है तो चीख… ताकि गाँव के लोग तो देखें कि मैं गलत हूँ कि तू..”- जमींदार अपनी बेशर्मी पर हँसते हुए।

बुधिया समझ चुकी थी कि मैं बहुत बुरी तरीके से फंस चुकी हूं आज मेरी या तो अस्मत जाएगी या फिर शरीर से चमड़ी। कशमकश भावों का आना जाना लगा था कि   जमींदार की आवाज उसके कानों में पड़ी-

“बुधिया इस समस्या से निकलने का तेरे पास केवल एक उपाय है… कहे तो बोलूँ… चल बोल ही देता हूँ… तू आज रात मुझे खुश कर दे। मैं तुझे छोड़ दूंगा और तू मुझे छोड़ देना…बस हिसाब बराबर”- जमींदार ने अपनी बुरी नीयत उसपर डालते हुए।

बुधिया रोई जा रही थी। जमींदार के सामने बहुत मिन्नत की, कि उसे जाने दे किन्तु उस समय जमींदार के सर पर वासना का भूत सवार था। वो इस समय को किसी भी हाल में जाने नहीं देना चाहता था… बस फिर क्या था… शेर अपना शिकार कर लिया।

बुधिया थकी-मांदी घर पहुँचकर कोमलिया को पानी देती है और चुपचाप अपने बिस्तर पर जाकर लेट गई। उसका हिया जोर-जोर से रोने को कर रहा था पर रोये तो क्या कहकर… फिर रहा न गया तो बुध्दु को उठाकर सारी आपबीती सुनाई। बुध्दु एक बार तो गुस्सा किया फिर थोड़ी देर बाद ही उसने कहा-

“देख बुधिया… हम लोग ठहरे छोटी जाती के… कर भी क्या सकते है इन लोगों का… चुप रहने में ही हमारी भलाई है..”

अगली सुबह-

बुधिया बाल्टी लेकर नदी की तरफ चल दी। रास्ते भर वो जमींदार को गाली देती जा रही थी कि सामने जमींदार को फिर जीप पर देखकर घबरा गई। जमींदार उसी बेशर्मी से बुधिया का रास्ता रोकते हुए-

“क्यूँ बुधिया.. कल रात ही मुझे पता चला कि तु कितनी सुंदर है।”

“अब मैंने कौन सी गलती कर दी कि तु हिसाब बराबर करने आया है”- बुधिया गुस्से में

जब किसी की नजरों से इंसान गिर जाता है तो वो ‘आप’ से ‘तु’ पर आ जाता है वही हाल बुधिया के साथ था।

“देख बुधिया… तुने गलती तो की है… जिसका हिसाब अभी बाकी है…देख तेरी फोटो… जिसमें तु मेरे कुएँ से पानी निकाल रही है..”- जमींदार बुधिया की तरफ फोटो उछालते हुए।

बुधिया फोटो देखती ही रह गई.. फिर उसे याद आया.. जो बिजली चमकना समझ रही थी दरअसल उसकी फोटो खींची गई थी।

“तु इतना कमीनागिरी पर उतर जाएगा मैं सोच भी नहीं सकती थी”- बुधिया फोटो फाड़ते हुए।

“सो तो हूँ…चिन्ता मत कर… इसकी और भी फोटो है… और हाँ सोच ले… मैं जब चाहूँ तेरे साथ कुछ भी कर सकता हूँ अब तु मेरी रखैल है..”- जमींदार बुधिया के बाल पीछे के तरफ खींचकर अपनी जीत का जशन मनाते हुए।

अब जमींदार का आतंक बुधिया पर दिनों दिन बढ़ता ही जा रहा था। खेत हो… नदी हो… रात हो… दिन हो यहाँ तक बीमार हो तो भी जमींदार बुधिया का पीछा न छोड़ता।

कुछ दिनों से बुधिया बहुत बीमार चल रही थी। दो डग चलना मुश्किल था। उस दिन बुध्दु कटाई करने के लिए जमींदार के खेत पर गया हुआ था। कोमलिया अपनी माई को पानी पिला रही थी कि इतने में दरवाजे पर जमींदार आ खड़ा हुआ। उसकी नजर कोमलिया पर पड़ गई तभी-

“जा… रे कोमलिया…अंदर जाकर पढ़…” -बुधिया कराहते हुए।

कोमलिया के अंदर जाते ही जमींदार बोल उठा-

“क्या रे बुधिया… तेरे घर इतना सुंदर हीरा… कहाँ छुपाकर रखी थी… अब तेरी तबीयत ठीक नहीं रहती। बस तेरी जगह इसको भेज देना रात को… वरना… तेरी फोटो पूरे गाँव वालों को दिखा दूंगा…”- जमींदार एक टक उस टाट के पर्दे को देखते हुए, जिधर से कोमलिया गई थी।

इधर बुधिया पर जमींदार के कहे एक-एक शब्द ऐसे लग रहे थे मानों कोई पिघला शीशा उसके अन्दर उढ़ेल दिया हो। वो तड़प कर रह गई। ज्यों-ज्यों समय बीत रहा था त्यों-त्यों बुधिया बेचैन हुई जा रही थी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि कैसे इस राक्षस से अपनी बेटी को बचाए।

शाम ढल चूकी थी। बुधिया कोमलिया को तैयार कर अपने साथ उसी मढ़ई पर ले गई जहाँ उसे पहली बार जमींदार ले गया था। मढ़ई के अन्दर जाकर कोमलिया को बुधिया ने कुछ समझाया।

कुछ देर में जमींदार के आते ही पूरी मढ़ई खुशबू से महक उठी। उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि बुधिया इतनी जल्दी मान जाएगी। परन्तु सच्चाई उसके सामने थी। मारे खुशी के जमींदार कोमलिया के बगल में बैठते हुए–

“अरे कोमलिया तु तो अपनी मां से भी ज्यादा खूबसूरत है”- जमींदार कोमलिया पर हाथ फेरते हुए।

“ये क्या कर रहे हो… सरकार…”- कोमलिया कोमल भाव से।

“क्या… तेरी माँ ने तुझे कुछ नहीं बताया क्या…?तेरी माँ तो बड़ी होशियार निकली…इतना तो मैं ने भी नहीं सोचा था”- जमींदार ने कोमलिया को लेटाते हुए।

इधर बुधिया अपने हाथ में हसुआ ले कर दरवाजे के पीछे से सब कुछ देख रही थी।

जब उसने सही मौका देखा तभी हसुआ से जमींदार पर वार करते हुए- “और तु कभी सोच भी नहीं सकता”- बुधिया अपने आपे से बाहर हो कर जमींदार पर हसुआ से वार पर वार किए जा रही थी। बुधिया का विद्रोही दिल चीख उठा-

“तुम अपने आप को ऊँची जाति का कहते हो इसलिए कि तुम्हारे पास पैसा है….रुतबा है… हम लोगों से काम करा कर मजदूरी देने में नानी मरती है। हम लोगों की बहू बेटियां देखी नहीं कि लार टपकाने लगते हो…उनकी मजबूरियों का फायदा उठाते जरा भी शर्म नहीं आती… यही हैं ऊँची जाति। सारे बुरे कर्म तुम लोग करो और नीच हम लोग कहलायें। हम लोग तुम्हारा कुआँ छू दें तो अशुद्ध हो गया और जब तुम लोग हमारी बहु बेटी को छू कर अपनी हवस मिटाते हो तो अछूत नहीं होते… वाह रे रिवाज ऊँची जाति का… ऐसे रिवाज पर मैं थूकती हुँ…”- बुधिया थूक कर वहीं बैठ जाती है। उसे पता ही नहीं चला कि जमींदार के कितने टुकड़े हो गए।

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