Nayi Disha | नई दिशा

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कहानी पढ़ें:

सारिका मात्र अभी सोलह साल की थी। उसकी शादी विष्णु से तेरह साल पहले ही कर दी गई थी। यानि जब उसकी शादी हुई तो वो मात्र तीन साल की थी। ये शादी भी कोई बहुत दूर न हुई थी। सारिका के पिता (भूषण सिंह) व विष्णु के पिता(प्रताप सिंह) की गहरी दोस्ती थी। दोनों का ठाकुर खानदान था। भूषण सिंह के यहाँ रोज शाम शतरंज की बिसात बिछती।

जब भी आपस में कोई बात करनी या सुख- दुःख बाँटना होता तो शतरंज के बीच खेलते हुए होती। जैसे शतरंज की मोहरे दोनों की दोस्ती की गवाह हो। जब इनके घरों में एक के यहाँ लड़की व दूसरे के यहाँ लड़का हुआ तो इन दोस्तों के बीच अपनी दोस्ती को और गहरी करने के लिए सोची-

“प्रताप एक बात करनी है तुमसे..”-भूषण सिंह ने शतरंज में वज़ीर को आगे बढ़ाते हुए।

“हाँ भूषण बोलो…”- प्रताप सिंह ने शतरंज की चाल चलते हुए।

“मैं सोच रहा हूँ कि क्यों न हम दोनों की दोस्ती… रिश्तेदारी में बदल दी जाए। मेरी लड़की और तुम्हारा लड़का…”- भूषण आँखों से शरारत भरी दृष्टि से देखते हुए।

“अरे…वाह भाई…क्या बात है…मैं भी कई दिनों से यही बात तुमसे कहना चाहता था। आ गले लग जा”- प्रताप सिंह कहते हुए भूषण सिंह के गले लगकर एक दूसरे को बधाई देते हुए।



वो दिन भी आ गया। जब दोनों घरों में खुशियों की बारात सजी थी। शहनाइयां बज रही थी। बाराती-खराती दोनों ही पक्ष खुशी से फूले नहीं समा रहे थे। ठीक रात के नौ बजे बारात दरवाजे पर लग चूकि थी। किन्तु दूल्हा व दुल्हन मात्र तीन साल के होने के कारण सो चूके थे। अब सभी रस्में पूरी तो करनी ही थी। इसलिए दोनों तरफ के एक- एक लोग आगे आये और दूल्हा-दुल्हन को गोद में लेकर सारी रस्में पूरी की गई। विदाई भी हो गई। जब सारिका की आँख खुली तो रोने लगी। रोना क्यूँ न आये, एक तीन साल की बच्ची को क्या मालूम कि शादी क्या होती है। जिम्मेदारी कैसे निभाई जाती है। इस समय तो उसे केवल माँ का सामीप्य चाहिए जो उस समय उसको माँ कही दिखाई नहीं दे रही थी। ये तो अच्छा था कि प्रताप सिंह का घर पास ही था तुरन्त सारिका को रस्मों के साथ वापस भेज दिया गया। अब गौने के बाद ही सारिका को इस घर में बहु के रूप में आना था जो कि पूरे बारह साल के बाद होना था। दोनों परिवार एक दूसरे के लिए समर्पित थे। कभी विष्णु सारिका के पास खेलने आ जाता तो कभी सारिका विष्णु के पास खेलने चली जाती।

यूँ ही समय बीतता गया। आज सारिका पूरी दस साल की हो गई थी। इन सात सालों में उसने कितनी बार सब के मुँह से सुना होगा “सदा सुहागन रहो” परन्तु उसे कभी  इसका मतलब समझ न आता। सभी को हँसता देख वो खुद भी हँसकर भाग जाती। ये सारिका का बालमन ही तो था ,जो उसे नहीं मालूम ससुराल क्या होता है? रिश्ते क्या होते हैं? यहाँ तक कि पति व पति का प्यार क्या होता है? इन सभी सवालों से सारिका अन्जान थी।

एक दिन अचानक एक फोन कॉल ने सबकी ज़िन्दगी अस्त व्यस्त कर दी, जब भूषण सिंह जी को पता चला कि विष्णु नहीं रहा तो मानो उनके सर पर पहाड़ टूट पड़ा हो। हुआ यूँ कि विष्णु अपने दोस्तों के साथ खेत की मेढ़ के पास खेलने गया था। जहाँ पास में ही दरिया थी। खेल- खेल में विष्णु का पाँव फिसलकर दरिया में गिर गया बहुत खोज-बिन हुई किन्तु विष्णु के लाश का कोई अता पता नहीं चला। दोनों घरों में रोना-धोना मच गया था। पाँच-छः दिन बीत जाने पर भी जब विष्णु की लाश न मिली तो सभी ने अंदाजा लगाया कि हो सकता है दरिया में तेज बहाव के कारण लाश बह गई होगी, इसी सोच के साथ सभी ने उसका अन्तिम संस्कार कर दिया।

इधर सारिका का सिन्दूर पोछ दिया गया। चुड़ियाँ तोड़ दी गई। बाल कटवा दिये गए। सारिका रो-रोकर बोलती रही-

“माँ…मेरा बाल क्यूँ कटवा रही हो…”

“तुम विधवा हो गई हो बेटा… इसलिए इस बाल का कट जाना ही उचित है…”- पास- पड़ोस की औरतें समझाते हुए। परन्तु सारिका का मन मानने को तैयार न था बाल कटवाने के लिए लेकिन उस समय वो कुछ न बोल पाई। कब वो सुहागन हुई और कब विधवा…उसे पता ही नहीं चला। ठाकुर घराना था। ठाकुरों की चलती थी। साधारण वस्त्र पहना दिये गए। ये सभी कुछ उसका कोमल मन देख रहा था। किन्तु उसे समझ नहीं आ रहा था कि क्यूँ माँ ने चूड़ियाँ तोड़ी? क्यूँ सिन्दूर पोछ दिया गया? पहले जब वो नहीं लगाती थी तो डांट कर लगवाती थी और आज….।

उस समय ठाकुर खानदान में अजीब रिवाज था, जो विधवा हो जाए उसे अपशगुन समझा जाता था। किसी भी शुभ कार्य में भाग नहीं ले सकती थी। न ही उसे खुश रहने, हँसी- मजाक करने का अधिकार था। यहाँ तक कि उनकी दुबारा शादी के लिए सोचना भी पाप माना जाता था।

परन्तु क्या इसमें सारिका का दोष था। सब को रोता देख खुद भी रोने लगी। चाहे उसका बालमन समझ ही नहीं पा रहा था कि क्यूँ सभी लोग रो रहे हैं।

अब सारिका के जीवन में बहुत बदलाव आ गया था। रोक- टोक की दखलअंदाजी बढ़ गई थी। बात-बात पर उसे रोका-टोका जाने लगा.. ये मत करो… ऐसे मत रहो…ऐसे खाओ…वैसे रहो….। सारिका को शब्दों से मालूम था कि मेरा पति मर चुका है किन्तु एहसासों से वो कोसो दूर थी। कई बार वो चाहती कि बाहर बच्चों के साथ खेले परन्तु जब भी माँ से पूछती-

“माँ….बाहर मैं जाऊँ खेलने…”

“नहीं बेटा… अब तुम दूसरे बच्चों के साथ नहीं खेल सकती…”- माँ ने सारिका को प्यार से समझाते हुए।

“क्यूँ माँ…मैं अब क्यूँ नहीं खेल सकती…पहले तो आप खुद मुझे खेलने के लिये भेजा करती थी”- सारिका ने मासूमियत से पूछा।

सारिका को जवाब भी मिला परन्तु उसके समझ से परे था।

आज सारिका सोलह साल की तो हो गई थी किन्तु उसकी ज़िन्दगी बेरंग हो गई… ना उसके चेहरे पर कोई खुशी, ना हँसी थी। अब सारिका को अपने विधवा होने की बात भी समझ में आ गई। उसके लिए संसार के सुखों के दरवाजे सभी बन्द थे। सारिका के दुःखी होने का कारण विधवा होना नहीं बल्कि इन सामाजिक कुरीतियों से था। वो अक्सर सोचती…जिन बच्चों को अपना होश नहीं, उन बच्चों की इतनी छोटी उम्र में शादी कहाँ तक न्याय है?दुर्भाग्यवश मेरे साथ जो कुछ हुआ तो क्या उसमें मेरा दोष था, जो कि मैं सांसारिक खुशियों से वंचित रहूँ? क्या मैं इंसान नहीं? क्या मेरी इच्छाएं नहीं, जो मेरे साथ हुआ वही अगर विष्णु के साथ होता तो क्या उसके साथ भी वही होता जो मेरे साथ हुआ।

नहीं…इन सामाजिक कुरीतियों का नियम ही बड़ा अजीब है। औरतों के लिए कुछ व मर्दों के लिए कुछ। ये समाज वालों ने ही दोनों के लिए अलग- अलग माप दण्ड निर्धारित कर रखें है।

जब सारिका की सहेलियां ससुराल से आकर एक विशेष प्रकार की हँसी हँसते हुए उससे सारी कथा कहती तो सारिका की जवानी के उमड़े हुए सागर में मतवाली लहरें उठने लगती। वो विचलित हो उठती। उसका भी मन करता कि उसका भी घर-संसार हो। वो भी अपनी सहेलियों के पास आ कर हँसी-ठिठोली करें। उसपर से वो सारे सामाजिक बन्धन हट जाए जो आज उसपर लगे हैं। वो उन्मुक्त होकर जीना चाहती थी।

शुक्र है अब लोगों की सोच बदल रही थी लेकिन अभी भी पूर्ण रूप से बदलने में समय था।

भूषण सिंह व प्रताप सिंह में आज भी दोस्ती बरकरार थी। किन्तु सारिका को लेकर भूषण सिंह से ज्यादा प्रताप सिंह चिन्तित रहते थे। इतने में दूसरे गाँव से एक रिश्ता आया-

“प्रणाम ठाकुर साहब…”- उस अजनबी ने कहा।

“बोलो भाई…कैसे आना हुआ”- भूषण सिंह ने कहा।

“ठाकुर साहब सुने है आपकी बिटिया ब्याहने योग्य हो गई है। उनके लिए एक योग्य वर का रिश्ता लाया हूँ”- उस अजनबी ने कहा।

“तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई यहाँ रिश्ता लाने की…तुम्हें नहीं

मालूम…मेरी बेटी बाल विधवा है…”- भूषण सिंह ने भड़कते हुए।

“मुझे मालूम है सरकार किन्तु प्रताप सिंह जी ने ही बगल वाले गाँव के ठाकुर साहब के मझले बेटे के लिए अपनी बहू का प्रस्ताव भिजवाये थे”- उस अजनबी ने प्रताप सिंह की तरफ इशारा करते हुए।

“क्या…प्रताप तुमने… ये मालूम होते हुए कि सारिका….?”- भूषण सिंह आश्चर्य से प्रताप सिंह की तरफ देखते हुए।

“हाँ… मैंने ही भेजा था… अब मैं उसका पिता हूँ… उसका सुख-दुःख देखना मेरा फर्ज़ है… अभी उसकी उम्र ही क्या है… समय बहुत बदल चुका है मेरे दोस्त… अब मुझसे सारिका का दर्द देखा नहीं जाता…”- प्रताप सिंह के आँखों में आँसू छलछला आये।

भूषण सिंह को बहुत समझाया- बुझाया गया। फिर भूषण सिंह जी प्रश्न सूचक दृष्टि से प्रताप सिंह की तरफ देख कर बोलते हैं-

“परन्तु समाज क्या कहेगा…”?

“समाज….समाज हमारा परिवार है। उसको समझाना हमारा कर्तव्य है। समाज का क्या? समाज भी इन कुरीतियों से निकलना चाहता है किन्तु किसी में पहल करने की हिम्मत नहीं होती। जब समाज के विरुद्ध कोई संघर्ष करता है तो पहली बार संघर्ष करने वाले को कठिन परिश्रम तो करना ही पड़ता है। इन कुरीतियों से लड़ने के लिए किसी को तो आगे बढ़ना ही पड़ेगा। तब देखना तुम्हारे पीछे- पीछे अपने आप पूरा समाज चल पड़ेगा। क्या हमारी बेटियां यूँ ही घुट-घुट कर मर जाएगी? नहीं… मैं सारिका के साथ ऐसा हरगिज नहीं होने दूँगा…”- प्रताप सिंह मानो दृढ़ निश्चय कर बैठें हों इन कुरीतियों को बदलने का।

भूषण सिंह अपने आप में शर्मिंदा हुए जा रहे थे कि मैं सारिका का बाप होकर ये सोच नहीं पाया जबकि ये ससुर होकर सारिका के लिए समाज के विरुद्ध खड़ा हो गया। अपने दोस्त के अन्दर इतना विश्वास देखकर भूषण सिंह गौरान्वित हो उठे।

ये सारी बातें सारिका व ठकुराइन (भूषण सिंह की पत्नी) दरवाजे के ओट में सुन रही थी। ठकुराइन का जी गदगद हो गया था… ऐसा समधी पाकर और जैसे ही सारिका ने रिश्ते की हामी सुनी। उसका मन खुशी से नाच उठा…वास्तव में उसके सारे सपने पूरे होने जा रहे थे।

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