Daag | दाग

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कहानी पढ़ें:

छोटे से छोटे शहरों में भी अपार्टमेंट्स की कमी नहीं होती। इन अपार्टमेंट्स में कोई एक कामवाली लग जाए तो क्या मजाल कि उसके काम पर नज़र लग जाए । एक काम के बजाए उसे दस काम मिल जाते । वही हाल धोबी का था । अब इन्हें आराम क्यों न हो एक ही जगह जाकर दस-दस घरों से कपड़े मिल जाते और कमाई भी अच्छी खासी हो जाती ।

ऐसे ही एक अपार्टमेंट में धोबी जग्गु काम करता था। दिनभर में पाँच-दस घरों के कपड़े धो/प्रेस कर लिया करता ।

एक दिन राजन के घर पर धोबी (जग्गु) ने कपड़े धोकर गुसलखाना साफ किया और तब कमरे में आकर राजन की पत्नी(प्रियंका) से बोला-

“भाभी देख लीजिए , मेरा काम हो गया । भाभी, अगर आज कुछ रुपये मिल जाए तो बड़ी मेहरबानी होगी”-  जग्गु ने कहा

“क्यों? अभी तो महीना खत्म ही नहीं हुआ इतनी जल्दी”- प्रियंका ने कहा

“हाँ भाभी , क्या करूँ? चार-चार बच्चों को मेरे माथे पर ही छोड़ कर चली गई । इतना भी न सोचा कि मैं कैसे इन चारों को संभालूंगा”- जग्गु रुआँसा होकर ।



“तुम दूसरी शादी क्यों नहीं कर लेते, तुम्हें एक अच्छी पत्नी मिल जायेगी और बच्चों को माँ “- प्रियंका ने समझाते हुए ।

” नहीं भाभी …इन बच्चों को तो माँ नहीं मिलेगी, हाँ… मुझे पत्नी जरूर मिल जायेगी , फिर  इन बच्चों का क्या होगा? सबसे छोटा वाला तो अभी केवल डेढ़ साल का ही है। मेरी सबसे बड़ी बेटी जो कि दस ही साल की है वही घर व् बाकी बच्चों को देखती है- ” जग्गु ने कहा

“लो ये रुपये· · किसी और चीज की भी जरूरत हो तो निःसंकोच माँग लेना· · शर्माना मत”- प्रियंका पैसे देते हुए ।

“भगवान आपका भला करे, इतना आज के समय में कौन सोचता है आप बहुत ही अच्छी हैं, कितना ख्याल रखती है हमलोगों का ।दूसरे घरों में तो भाभियाँ बात तक नहीं करती, तो दुःख क्या पूछेंगी । जैसी शक्ल- सूरत दी है वैसा दिल भी दिया है। भगवान आपको बनाएं रखें”- जग्गु ने कहा।

“चलो भाई….मसखा नहीं”- प्रियंका ने हँसते हुए कहा।

“अच्छा एक बात पूछू-” जग्गु ने कहा

“जल्दी पूँछो… मुझे और भी काम है , तुम्हारे भइया ऑफिस से आते ही होंगे । जल्दी से चाय चढ़ा दूँ नहीं तो   तुम जानते ही हो उनको “- प्रियंका कहते हुए रसोईघर में जाकर गैस पर चाय चढ़ाकर आती हैं- हाँ.. अब बोलो ।

“क्या भाभी , भइया शुरू से ही ऐसे थे”- जग्गु ने कहा।

क्या मतलब…?-प्रियंका ने कहा

मेरा मतलब भइया का व्यवहार आपके प्रति शुरू से ही इतना खराब था”-जग्गु थोड़ा संकुचाते हुए ।( जैसे जग्गु ने अंजाने में ही प्रियंका की दुखती रग पर हाथ रख दिया हो ,वो जैसे बहुत कुछ बताना चाहती थी कि इतने में राजन आ जाता है। राजन को देखते ही-

“फिर कभी भाभी …मैं चलता हूँ”- जग्गु ने जाते हुए ।

राजन आते ही-

“जग्गु क्या कह रहा था? इन सब से क्यूँ मुँह लगती हो? जरूर तुम को भड़का रहा होगा । इन सालो की आदत ही ऐसी होती है । इस घर की बात उस घर और उस घर की बात इस घर “-बड़बड़ाता  हुआ राजन अपने कमरे में चला जाता है।

“कुछ नहीं…बस ऐसे ही.. अपना दुखड़ा रो रहा था। कुछ रूपयों की जरूरत थी बच्चों के लिए। सो मैंने उसे दे दिया । वैसे बातचीत बड़े ढ़ंग से करता है”- प्रियंका ने राजन को चाय थामते हुए।

“तुम्हें तो बस बातें करने को कोई चाहिए… और कोई नहीं तो धोबी ही सही। पता नहीं ऐसी बदसूरत शक्ल वाले से कैसे बात कर लेती हो”- राजन ने कहा।

“मुझे उसकी शक्ल से क्या लेना देना? वो अपना दुखड़ा  सुनाता है तो सुन लेती हूँ। सुनने में हरज ही क्या हैं”- प्रियंका अपनी सफाई देते हुए ।

“हूँ…. मुझे जग्गु अच्छा आदमी नहीं लगता । इसको आये हुए साल – छः महीने ही हुआ है और तभी से देख रहा हूँ कि तुम्हारे तेवर भी कुछ बदले – बदले से रहते हैं। जब देखो तुम से बातें करने का बहाना ढूंढता ही रहता है ।”- रजन ने थोड़ा शक जाहिर करते हुए।

“शक मत किया कीजिए । ज्यादा शक करने से आदमी शक्की हो जाता हैं इसी शक ने तो कितने घर बर्बाद कर दिए ।  आपको कैसे समझाऊं? मैंने तो आपके सिवा किसी की तरफ आँख उठाकर भी नहीं देखा । मेरे लिए तो आप ही बहुत हो । आप के अलावा दूसरों को देखकर क्या करुँगी?”- प्रियंका कहते हुए वहाँ से चली जाती है।

प्रियंका सोचने लगी…

उफ्फ… कितना शक करते हैं, क्या उन्हें मुझपर ज़रा भी विश्वास नहीं । परसो श्रीवास्तव जी मेरा हाल- चाल क्या पूछ लिए ,उस दिन भी । मुझे समझ नहीं आता कि ये क्या चाहते हैं? अगर मैं किसी से न बात करूँ तो पास – पड़ोस से कहते फिरेंगे कि प्रियंका सामाजिक नहीं है उसे समाज में रहना ही नहीं आता, ना किसी से बात करती है और ना ही किसी के घर जाती है…बड़े अजीब आदमी है। भगवान ही मालिक है इनका ।

अगले दिन दरवाजे की घंटी बजती है-

“अरे…जग्गु ..आज इतनी जल्दी , कहीं तुम्हें जाना है क्या ?”- प्रियंका ने कहा।

“नहीं भाभी…आज थोड़ी तबियत ठीक नहीं थी छोटू की , इसलिए फोन से, सभी जगह से छूट्टी ले ली थी। परन्तु घर पर पड़े – पड़े मन नहीं लग रहा था तो सोचा चलो भाभी का ही काम कर दें”- जग्गु ने कहा

“अच्छा किये जग्गु तुम आ गये, आज कपड़े भी बहुत हो गये हैं”- प्रियंका ने कहा

“अच्छा भाभी आपने बताया नहीं भइया के बारे में”- जग्गु कपड़ा धोते-धोते ।

” छोड़ो जग्गु फिर कभी”- प्रियंका टालते हुए ।

“भाभी आप मलिक जी को जानती हैं जो सी-ब्लॉक के आठ नम्बर में रहते हैं । जिनके यहाँ मैं काम करता हूँ”-जग्गु ने कहा ।

“नहीं…क्यूँ ?”-प्रियंका अनभिज्ञता जताते हुए ।

“क्या बताये भाभी ? बोलना तो नहीं चाहिए, परंतु आपको अपना समझता हूँ तो बोल देता हूँ । वो मलिक जी है न…उनका न…किसी से चक्कर चल रहा है। आजकल भाभी तो मायके गई हुई है फिर औरत का कपड़ा….धोने में….कैसे आ जायेगा ? मैं तो कपड़े देखते ही समझ गया था, जरूर कोई न कोई बात है नहीं तो मलिक जी दिन- रात भाभी से झगड़ा क्यूँ करते । आज जाकर समझ आया, क्या चक्कर है?”- जग्गु ऐसे कह रहा था मानो उसने कोई गुत्थी सुलझा ली हो ।

“जग्गु….तुम क्यों किसी के बारे में ऐसा कहते या सोचते हो । हो सकता है कि वो सच में भाभी के ही कपड़े हो और वो धोने के लिए छोड़ कर गई हो”- प्रियंका ने अपनी तरफ से जग्गु को समझाते हुए ।

“भाभी आप बहुत भोली है । दुनियां में क्या- क्या होता है, आप क्या जानो? आजकल तो भाभी आज बीवी मरी नहीं कि दूसरे ही दिन नई बीवी ले आते हैं ये भी नहीं कि कम से कम तेरह दिन तो रुक जाए”- जग्गु ने कहा ।

“तुम ठीक कहते हो भाई”- प्रिंयका दुनिया के प्रति अफसोस जाहिर करते हुए ।

जग्गु जा ही रहा था कि राजन आ पहुँचे । जग्गु की पिछली बात उनके कान में पड़ गई थी ।

जग्गु ज्यो ही नीचे गया कि राजन प्रियंका से बोला-

“मैंने तुमसे कहा था न कि जग्गु से बातें मत किया करो। क्या कह रहा था दूसरे की बीवीयों के बारे में ?”-

“कुछ नहीं…ऐसी तो कोई बात न थी”- प्रियंका टालते हुए ।

“थी क्यों नहीं…मैं ने साफ़ सुना है”-राजन ने कहा ।

” मुझे तो ध्यान नहीं…कौन सी उसी की बात कान लगा कर सुनती हूँ”- प्रियंका जाते हुए ।

“तो…क्या..वह दीवार से बाते कर रहा था या इस घर में कोई और भी है? देखो कल ही मैं उसको हटाता हूँ तुम सोचती हो कि मैं समझ नहीं रहा हूँ”- राजन गुस्साते हुए।

“उस बेचारे के पेट पर क्यूँ लात मारते हो”-प्रियंका ने कहा ।

इतना ही प्रियंका का बोलना था कि राजन प्रियंका को जानवरों की तरह मारने लगा । बेचारा ..तुम देखती जाओ ..मैं क्या करता हूँ”- राजन जैसे अपना सारा गुस्सा इसी बहाने निकाल रहा हो ।

“ठीक है आप उसको कल ही मना कर देना”- प्रियंका रोते हुए ।

” क्यों तुम नहीं मना कर सकती”- राजन चीखते हुए ।

अब प्रियंका तिलमिला जाती है । उसके बर्दास्त से बाहर हो जाता है प्रियंका का गुस्सा फूट पड़ता है-

” क्या आपको शर्म आती है अपनी पत्नी पर हाथ उठाने पर । आप अपने आप को मर्द कहते हो । आपको पहले भी कह चुकी हूं कि शक मत किया करो । देख लेना एक दिन शक के कारण अपना घर तबाह कर बैठोगे”।

” तुम ये क्यों नहीं बोलती कि तुम्हें जग्गु के साथ भागना है”- राजन ने कहा ।

“फिर आप अपनी मर्यादा से बाहर जा रहे हैं । आपको थोड़ी भी लज्जा नहीं आती । अपनी पत्नी को क्या -क्या बोले जा रहे हो । आज आप जग्गु के लिए बोलते हो…पहले श्रीवास्तव जी और शर्मा जी के लिए बोला करते थे । क्या मैं आपको वैश्या लगती हूँ जो सभी के साथ… छी..छी..”- प्रियंका रोते बिलखते बोली जा रही थी ।

राजन पैर पटकता हुआ घर से बाहर निकल जाता है । उसका मन अशांत था । पूरे रास्ते उसे समझ नहीं आ रहा था कि प्रियंका की इसमें कितनी गलती है बस वो यही सोच रहा था कि मैं तो दिनभर ऑफिस रहता हूँ। पीछे से पता नहीं क्या – क्या गुल खिलाती होगी ।

रात के ग्यारह बज गये थे । बार – बार प्रियंका घड़ी को देखी जा रही थी और उसने निश्चय कर लिया था कि कल ही जग्गु को हटा देगी ।बेफालतू उसकी वजह से घर में कलह हो, क्या फायदा ।

इतने में दरवाजे की घंटी बज उठती है । प्रियंका देखती है कि दो लड़के राजन को पकड़कर कंधे के सहारे लेकर खड़े थे-

“इनको क्या हुआ”–  प्रियंका ने कहा।

“मैडम ..बार में ज्यादा पीने के कारण अपने आपे में नहीं थे । तब हमलोगों ने इनकी जेब से ड्राइविंग लाइसेंस निकालकर देखा तो यही का पता लिखा था”- उन लड़कों ने कहा ।

“उनको वहाँ लेटा दो”-प्रियंका ने कमरे की तरफ इशारा करते हुए ।

सुबह राजन की जैसे ही आँख खुली-

“ओह…बहुत भारी लग रहा है”- राजन सर पर हाथ रखते हुए।

“कुछ ज्यादा ही हो गई”- राजन की अचानक एक रुमाल पर नज़र गई । रुमाल को हाथ में उठाते हुए ।

“ज्यादा नहीं.. बहुत ज्यादा ही हो गई थी। कल आपको दो लड़के पकड़कर लाये थे वरना पड़े रहते वही पर”- प्रियंका ने राजन को चाय पकड़ाते हुए ।

“प्रियंका.. ये रुमाल किसकी है?”- राजन रुमाल दिखाते हुए।

” शायद ..ये उन दोनों लड़कों में से एक की होगी, जो आपको कल रात यहाँ छोड़ने आये थे”- प्रियंका  ने कहा।

“दो लड़के ……….”- राजन विस्मय से (फिर राजन के अन्दर का शक कुलबुलाने लगा)

“हाँ… दो लड़के , थे बड़े भोले..वही तो आप को यहाँ पहुँचा कर गये थे”- प्रियंका कमरे की तरफ इशारा करते हुए।

उन लड़कों को घर में बुलाने की क्या जरुरत थी, कितनी बार तुमको समझाया है कि अजनबियों को घर में लाया मत करो ,परन्तु तुम्हें तो समझाना ही बेकार है”- राजन तुनकता हुआ ।

इधर प्रियंका सोचने लगी कि अब मेरी इसमें क्या गलती है ,जो राजन फिर चिड़-चिड़ करने लगे ।अगर उन लड़कों को घर के अन्दर न घुसाती तो राजन को घर के अन्दर लाता कौन ? मेरे से तो ये उठते नहीं और घर में था ही कौन ? ये तो मेरी मजबूरी थी। वरना…- प्रियंका सोचते- सोचते राजन का नाश्ता तैयार करने लगी।

कुछ दिनों बाद…-उन दोनों लड़कों में से एक लड़का अचानक प्रियंका के घर आता है-

“नमस्ते भाभी , इधर से गुजर रहा था तो सोचा ,भइया का हाल-चाल पूछता जाऊँ। अब ठीक है न भइया”- उस लड़के ने कहा ।

“हाँ भइया.. किन्तु हमारी इतनी पुरानी जान पहचान तो है नहीं कि आप दुबारा उनकी खैरियत पूछने आ जाओ”- प्रियंका ने व्यंग में कहा।

इतने में जग्गु घबराते हुए आता है-

” अरे..जग्गु तुम…कैसे आना हुआ “- प्रियंका ने आश्चर्य से ।

“क्या बताऊँ भाभी ? मेरा सबसे छोटा बेटा कल सड़क पर खेल रहा था कि किसी गाड़ी वाले ने इतनी जोर से टक्कर मारी कि उसका दाँया हाथ व् दाँया पैर टूट गया। मुसीबत के समय तो आपके सिवा कोई दिखता ही नहीं। कुछ रुपयों की जरुरत थी सोचा आपसे कुछ मदद हो जायेगी “- जग्गु घबराते हुए ।

“हाँ.. हाँ.. क्यों नहीं..इंसान, इंसान के काम नहीं आयेगा तो कौन आयेगा”- प्रियंका रुपये लेने जाने लगती है।

“अच्छा भाभी .. फिर मैं चलता हूँ”- उस अजनबी लड़के ने संकुचाते हुए ।

प्रियंका रुपये लाती है-

“लो पाँच हज़ार रुपये(5000/-)”- प्रियंका जग्गु की तरफ बढ़ाते हुए।

” भगवान आपकी खुशियों को बनाये रखे”- जग्गु जाते- जाते।

किन्तु होनी कुछ और ही लिखी थी । उस लड़के का व जग्गु का निकलना और राजन का आना इत्तफाक था पर ये इत्तफाक इतना बड़ा भूचाल लेकर आयेगा, ये किसी को न मालूम था|

राजन आते के साथ ही प्रियंका पर ‘ आव देखा न ताव ‘ घूँसा व् थप्पड़ बरसाने लगा । राजन क्रोध से पागल होया जा रहा था कि प्रियंका को इतनी जोर से धक्का दिया कि सीढ़ियों से गिरते- गिरते बची किन्तु मारपीट के कारण कपड़े फट गये थे ।तब राजन ने गले पर हाथ रखकर बोला-

” मैंने कहा था न जग्गु से दूर रहना और अब तो जग्गु के साथ- साथ दूसरा भी चला आ रहा है। तुम अपने आप को सती सावित्री कहती हो। जान से मार दूँगा.. तुझे भी और उन्हें भी”- राजन कहे जा रहा था।

मगर प्रियंका न रोई, न चिल्लाई , न जबान से एक शब्द निकाला केवल अर्थ शून्य नेत्रों से पति की ओर देखे जा रही थी मानो यह निश्चय करना चाहती थी कि बस बहुत हो गया इस आदमी के साथ.. अब आगे नहीं ।

राजन गुस्से में पैर पटकता हुआ घर से बाहर निकल जाता है।

उस के जाते ही प्रियंका का सब्र का बाँध टूट जाता है वो फूट- फूट कर रोने लगी।क्रोध में खूबसूरत यादें भी समाप्त हो जाती है। प्रियंका को याद नहीं पड़ता कि कभी राजन उससे प्रेम से दो पल बात भी किया हो। कभी थोड़ा बहुत प्रेम किया भी होगा तो वो अपने मतलब से । जहाँ इज्जत नहीं , मर्यादा नहीं, प्रेम नहीं , विश्वास नहीं वहाँ रहने का क्या फायदा । क्या जरूरत है अत्याचार सहने की। लोग सही कहते हैं-

‘अत्याचार करने वाले से ज्यादा

अत्याचार सहने वाला दोषी होता है’

जब मैंने कोई गुनाह ही नहीं किया तो मैं क्यूँ उसकी सजा पाऊँ।

आज प्रियंका को समझ आया कि राजन की शक की बुनियाद इतनी गहरी हो चूंकि है कि उसको हिलाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है। इसी के साथ सहसा उसके कदम अपने आप पुलिस स्टेशन की तरफ बढ़ जाते है।

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