Talaak | तलाक

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कहानी पढ़ें:

अदालत रोज की तरह आज भी खचाखच भरी थी। अन्तर था तो बस चेहरों का। आज उनमें से एक चेहरा था तो रजत व राधिका के तलाक का। एक तरफ रजत का वकील व उसके रिश्तेदार थे तो दूसरी तरफ राधिका का वकील व उसके रिश्तेदार थे। जज जैसे ही अदालत के कमरे में घुसा वैसे ही सभी अपनी जगह खड़े हो गए। अब बारी थी तो दोनों तरफ के वकीलों के जिरह की… जो चालू हो चुकी थी। रोप- प्रत्यारोपों का दौड़ शुरू हो गया…समझ नहीं आ रहा था कि दोनों अर्थात रजत व राधिका में कौन सही था और कौन गलत? इसी ऊहापोह में जज ने दोनों को कुछ महीने साथ- साथ बीतने का कहकर अगली सुनवाई की तारीख दे दी।

ये तारीख जज की तरफ से पहली बार न थी इस तलाक की सुनवाई के लिए पहले भी तारीखों पर तारीख… तारीखों पर तारीख… पड़ चुकी थी। अगली सुनवाई के साथ ही रजत व राधिका के चेहरों की रंगत जितनी नहीं बदली थी उससे कहीं ज्यादा उनके रिश्तेदारों की बदली हुई थी क्योंकि वो इस रिश्ते की अन्तिम आहुति देने के लिए तत्पर थे लेकिन अफसोस अब अगली सुनवाई तक इन्तजार करना था। उधर दोनों वकील जो अदालत के कटघरे में कुत्ता- बिल्ली की तरह लड़ रहे थे वो दोनों हाथ मिलाते हुए हँस कर चाय पीने में मशगूल थे। पूरा परिसर खाली हो गया था…रह गए थे तो केवल एक तरफ रजत तो दूसरी तरफ राधिका…जो दूर- दूर होने के बावजूद भी दिलों से करीब थे। लेकिन दोनों की अहम की दीवारें टकरा रही थी। यहाँ पर ‘हम’ के स्थान पर ‘मैं’ आ गया था। फिर अकस्मात दोनों एक दूसरे को नजर अंदाज करते हुए आगे बढ़ गए…रजत अपने ऑफिस की तरफ तो राधिका घर की तरफ।

राधिका जैसे ही घर पहुँची तभी-

“लो..महारानी जी फिर से इस घर में आ गई…”- सास ने राधिका के घर आते ही कहा।

“अरे माँ…. इसे तो कुछ बोलो ही मत… नहीं तो…हम लोगों के ऊपर भी प्रताड़ना का केस ठोक देगी…”- राधिका की ननद ने कहा।



राधिका सुनकर भी अनजान बनते हुए सीधे अपने कमरे में चली गई। परन्तु बाहर से तानें बराबर सुनाई पड़ रहे थी-

“अब देखो… महारानी बाहर से आई और सोने चली गई…. हम सब नौकर बैठे हैं न उसके… पता नहीं ये कलमुँही कब… इस घर से जाएगी….”- सास राधिका को सुनाते हुए।

इधर राधिका के सर में दर्द ऊपर से सास व ननद की जली-कटी… सुन-सुन कर मन फटा जा रहा था जैसे- सास-ननद ताने सुनाने में कॉम्पटीशन कर रही हो। कभी सास राधिका को तो कभी ननद राधिका को सुनाने में लगी थी। मन ही मन राधिका बड़बड़ाते हुए-

“कैसे इस अजायब घर में… मैं समय बिताऊंगी… अब तो रजत को भी कुछ अपने मन का नहीं बता सकती”। सोचते- सोचते राधिका रोने लगी। उसे अपने वो दिन याद आ गए जब रजत और राधिका दोनों एक दूसरे से बहुत प्यार करते थे। दोनों ने इस शादी के लिए क्या- क्या न पापड़ बेले। दोनों ही एक दूसरे के परिवारों को अपना बनाने में लगे थे।तब कहीं जाकर बड़ी मुश्किल से दोनों के परिवार वाले शादी के लिए तैयार हुए थे और आज…

इतने में ऑफिस से रजत आते ही-

“माँ एक कप चाय देना… सर भारी है…”

“क्यों नहीं अपनी बीवी से कहता…वो रानी महारानी केवल खटिया तोड़ेगी…”- रजत की माँ ने ऊँची आवाज में कहा।

“धीरे कहो माँ… वो कुछ समय के लिए यहाँ है…फिर वो अपने घर… मेरा उस पर क्या अधिकार…”- रजत ने माँ को चुप करवाते हुए।

“धीरे क्यों कहूँ…अभी तो वो तेरी बीवी है। अभी तो तेरा उसे सब कुछ करना पड़ेगा… जब जाएगी तब जाएगी…”- माँ ने रजत को हाथ नचाते हुए कहा।

रजत कुछ बोलता उससे पहले ही राधिका रजत के हाथ से उसका बैग ले जाती है जैसे उसने सास की सारी बातें सुन ली हो।

राधिका रजत के लिए चाय बनाने चली गई तभी रजत राधिका से-“राधिका तुम रहने दो…मैं खुद बना लूँगा…राधिका ने कुछ नहीं कहा चुपचाप चाय बनाती रही…थोड़ी ही देर में राधिका ने रजत को चाय का कप थामते हुए रसोईघर से बाहर निकल गई। रजत चाय की चुस्की लेते हुए अपने बीते दिनों को याद करने लगा-‘क्या वो दिन थे। राधिका यूँ ही हर शाम मेरे लिए चाय लाती और मैं उसे छेड़ने के लिए खींचकर अपने पास बैठा लेता उधर माँ जैसे आवाज लगती वो मेरा हाथ छुड़वा कर भागती ऐसे …जैसे उसने कोई भूत देख लिया हो …’- रजत मुस्कुराने लगा-‘वो भी क्या दिन थे… राधिका मुझसे कितना प्यार करती थी…’- रजत इधर उधर देखा… फिर अपनी यादों में डूब गया। ‘यूँ ही हमारी शादी के तकरीबन छः- सात साल बीत गए थे कि एक दिन माँ कहने लगी’-

“आखिर में तुम दोनों ही आपस में खुश रहोगे कि मुझे भी खुश रहने का अधिकार है…”

“क्या हुआ माँ… रजत ने पूछा

“क्या…क्या हुआ… मुझे भी खुश रहने के लिए एक पोता तो चाहिए… इस वंश को आगे बढ़ना है कि नहीं… कि ऐसे ही…”- माँ ने कहा।

“ठीक है माँ… हम लोग भी चाहते हैं… डॉक्टर को भी दिखा ही रहें हैं… अब ईश्वर की इच्छा…”- रजत ने मायूसी से।

माँ ने अपने बेटे का मुंह देख कर धीरे से दबी जुबान से रजत को कहने लगी-

“एक बात कहूँ… अगर न हो तो इसे छोड़ दे… मैं तेरी दूसरी शादी करवा दूँगी…”- राधिका की तरफ इशारा करते हुए।

“क्या… क्या बोल रही हो माँ…”- रजत लगभग चीख ही पड़ा था।

“इसमें मैंने क्या गलत बोला… कम से कम वंश चलाने के लिए एक पोता तो चाहिए… जब ये बेटा नहीं दे सकती तो… छोड़ दे मेरे बेटे का पीछा… मेरे बेटे के लिए लड़कियों की कमी है क्या…?”- माँ ने राधिका के मुखातिब होकर कहा।

“ये क्या कह रहीं हैं माँजी…इसमें मेरा क्या दोष…”- राधिका ने रोते हुए।

“दोष क्यों नहीं है… तुम ही ना पैदा करोगी बेटा… अभी तक दो- तीन हो जाने चाहिए थे…”-माँ ने कहा।

दोनों निरुत्तर हो गए। माँ की भावना को समझते हुए माँ को समझाना मुश्किल था। राधिका बोलने को बोल सकती थी कि इस में जितना मेरा दोष है उतना ही आप के बेटे का भी दोष है इसका ये मतलब ये नहीं कि मैं भी रजत को छोड़ दूँ….।

एक दिन अचानक…माँ ने एक पण्डित को घर लाते हुए-

“राधिका… ये बहुत प्रसिध्द पण्डित जी है… इनका आशीर्वाद कभी खाली नहीं जाता…आओ… इनसे आशीर्वाद ले लो…भगवान ने चाहा तो जल्दी ही तुम्हारी गोद भर जाएगी…”- माँ ने कहा।

माँ की आवाज सुनकर दूसरे कमरे से रजत आते ही माँ को एक कोने में ले जाकर कहने लगा-

“माँ… ये सब क्या नया नाटक है… आप टी.वी पर इतना कुछ देखती हैं फिर भी…”

“मुझे पता है इसलिए तेरे सामने ही आशीर्वाद दे कर चले जाएंगे… अगर इससे हमारे घर का कुल दीपक आ जाए तो क्या दिक्कत है…”

थोड़ा रुक कर फिर माँ ने कहा-

“फिर तो तेरे को कोई दिक्कत नहीं ना…”- माँ ने रजत को समझाते हुए।

“ठीक है… आपकी जो मर्जी वो करो…”- रजत ने अपनी माँ के आगे हार मानते हुए।

पण्डित जी आगे बढ़कर राधिका को आशीर्वाद के रूप में कुछ सामग्री देते हुए-

“बहू… इसे गुरुवार के दिन पीली साड़ी के पल्लू में बांध लेना और हर गुरुवार को वही साड़ी पहनना… तुम्हारी झोली जल्दी ही खुशियों से भर जाएगी…”

पण्डित जी थोड़ा रुकते हुए-

“लेकिन एक बात ध्यान रखना… बांधने के बाद वो साड़ी खोनी नहीं चाहिए… नहीं तो अनर्थ हो जाएगा…”

“अनर्थ कैसा पण्डित जी…”- सास ने पूछा।

“आप सभी की मुश्किलें और बढ़ जाएगी…”- पण्डित कहते हुए चला गया।

राधिका पढ़ी लिखी होने के कारण इन अंधविश्वासों को मानती नहीं थी परन्तु इसमें उसका नुकसान था भी क्या… बस फिर क्या था… अगले दिन ही गुरुवार था इसलिए राधिका उसी दिन एक पीली साड़ी खरीद कर ले आई। गुरुवार को पण्डित जी ने जैसा कहा था ..वैसा ही उसने किया| उसके अगले दिन साड़ी भी बहुत हिफाजत से धोकर सुखाई… बार-बार काम करते- करते साड़ी को देख लेती… पर ये क्या… दोपहर होते- होते तक उसकी साड़ी वहाँ से गायब हो गई… दौड़ कर अपनी सास से पूछने गई-

“माँ जी आपने मेरी साड़ी उतार ली क्या…”

“मैं…नहीं तो…क्यूँ… क्या हुआ…”- सास ने कहा

“माँ जी साड़ी नहीं दिख रही…”- राधिका ने डरते- डरते कहा।

“क्या तुने साड़ी खो दी… तुझे साड़ी देखनी नहीं चाहिए थी…पण्डित जी तो पहले ही बोले थे कि साड़ी खोनी नहीं चाहिए… हे भगवान…अब इस घर का क्या होगा…?”- सास बवाल मचाते हुए।

राधिका को समझ नहीं आ रहा था कि साड़ी गई तो कहाँ गई। घर में कोहराम मच गया…सास.. ननद सभी राधिका को बोले जा रही थीं। इतने में रजत घर पर आते ही-

“क्या हुआ माँ…क्यूँ इतना घर में शोर-शराबा है…”

“क्या बताऊँ बेटा…, जिसका मुझे डर था वही हो गया… साड़ी खो गई… अब इस घर का क्या होगा… भगवान ही जाने…?”- माँ ने रोते हुए कहा।

“राधिका… राधिका… देख रहा हूँ… आजकल तुम बहुत लापरवाह होती जा रही हो… एक साड़ी भी नहीं संभाल सकती थी…”- रजत ने राधिका को डाँटते हुए।

“छोड़ बेटा… इसको अगर इस घर की…इतनी ही चिन्ता होती तो साड़ी का ध्यान न रखती… अब फिर पण्डित जी को बुला कर पूछना पड़ेगा कि इस बला का क्या उपाय है…”- माँ ने रजत को राधिका के प्रति भड़काते हुए।

अगले दिन फिर पण्डित जी आ धमके। सास और पण्डित जी में तकरीबन एक- दो घण्टे बातचीत चली। फिर पण्डित जी ने राधिका को बुलाते हुए-

“लो बहू…ये भगवान का प्रसाद है। इसको सुबह घर की पूजा करने के बाद सास के हाथों पानी में घोल कर पी जाना… शायद भगवान ने चाहा तो सब ठीक हो जाएगा… और हाँ… इस प्रसाद को पीने से पहले तक सम्भाल कर रखना… कोई और लोग इसे खा न ले… नहीं तो फिर मैं इस घर को किसी भी हाल में मुसीबत से नहीं बचा सकता…”

राधिका डरते हुए उस प्रसाद को अपने अलमारी में रखते हुए यही सोचती हुई कि जल्दी से सुबह हो और इस प्रसाद को पीकर सारी समस्या खत्म करु। दरअसल राधिका आने वाली समस्या से ज्यादा वर्तमान की समस्या से ज्यादा परेशान थी।

अगले दिन राधिका उठने के कुछ समय बाद ही परेशान हो उठी क्योंकि पूरी अलमारी छान मारी परन्तु कहीं भी पण्डित जी का दिया हुआ प्रसाद नहीं दिख रहा था। इतने में सास ने आवाज लगाई-

“राधिका… पण्डित जी का दिया हुआ प्रसाद ले आओ… तुम्हें घोलकर दे दूँ…”

“आती हूँ…’- राधिका ने अनमने ढंग से कहा।

राधिका को खोजते हुए करीब एक- दो घंटे बीत गए तभी सास की आवाज उसके कानों में पड़ी-

“ये लड़की इस घर को बर्बाद कर के ही मानेगी… कब कहे थे पण्डित जी पीने को… अभी तक नहीं पी…राधिका… राधिका…’-गुस्से में माँ जी ने आवाज लगाते हुए।

जैसे ही राधिका ने बताया कि प्रसाद कहीं नहीं मिल रहा… वैसे ही मानों घर में भूचाल आ गया हो…सास… ननद… रजत सभी उसको खरी खोटी सुनाने लगे… बात इतनी बढ़ गई कि रजत का हाथ राधिका पर उठ गया। राधिका मारे गुस्से के अपना ससुराल छोड़ मायके चली आई। फिर क्या था…राधिका इस अपमान को बर्दाश्त न कर पाई और बात तलाक तक आ पहुँची……तलाक के लिए अदालत के दरवाजे खटखटा दिए गए और ज़िरहें चालू हो गई और आज अदालत ने राधिका को कुछ दिनों के लिए वापस रजत के साथ कर दिया।

इतने में रजत की नजर चाय के कप पर पड़ी जो ठण्डी हो चुकी थी। रजत ठण्डी आहें भरते हुए मन ही मन –

‘राधिका तुम ही हो इन सारी परेशानियों की जिम्मेदार… ना पीली साड़ी खोती… ना ही ये परेशानियां आती…’ सोचते हुए बालकोनी में घुमने लगा। तभी उसकी मां की आवाज उसके कानों में पड़ी-

“देखा मुन्नी… मैंने कर दिखाया ना… बड़ा… मुश्किल था राधिका से रजत का पीछा छुड़वाना आखिरकार मेरी मेहनत रंग लाई”- माँ ने अपनी जीत का सेहरा बांधते हुए।

“हाँ… माँ… मान गई आपको…भइया की दूसरी शादी करवाने के चक्कर में आपने तो एकदम फिल्मी हीरोइनों की तरह एक्टिंग की थीं… अच्छा माँ…एक बात बताओ… साड़ी तो समझ में आती है कि तुम ने उतार ली परन्तु प्रसाद…”- ननद ने माँ पर गर्व करते हुए।

“अरे पगली…प्रसाद गायब करना कोई मुश्किल काम थोड़े ही था…वो प्रसाद मैंने उड़ने वाले पदार्थ से बनवाया था जो हवा के सम्पर्क में आते ही आठ- दस घंटों में अपने आप उड़ जाएगा…फिर क्या था… अलमारी में पड़ा- पड़ा उड़ गया…”- माँ ने अपनी पीठ अपने ही थपथपाते हुए।

रजत सुनते ही ऐसा लगा मानो कदमों के नीचे से जमीन घिसक गई हो…’माँ…ये तुमने क्या किया अपने ही बेटे के जीवन में जहर घोल दिया एक बच्चे के खातिर। बच्चा तो हम लोग अनाथालय से लेने ही वाले थे फिर तुमने ऐसा क्यों किया माँ… मैं आज भी राधिका को बहुत प्यार करता हूँ परन्तु वो मुझे कभी माफ नहीं करेगी…’- रजत वही बैठते हुए रोया जा रहा था साथ ही कहता जा रहा था-‘मुझे माफ कर दो राधिका मैं तुम्हारा गुनहगार हूँ…’

आज रजत की तरफ से अहम व मद भेद की दीवारें टूट गई थी…घमंड चकनाचूर हो गया था…नफरत हमेशा के लिए दफन हो गया और राधिका दूसरे कमरे में सभी बातों से अनजान रजत से दूर जाने पर आँसू बहा रही थी।

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2 thoughts on “Talaak | तलाक

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