Paiso Se Bhara Bag | पैसो से भरा बैग

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कहानी पढ़ें:

चोर… चोर… पकड़ो… पकड़ो…दूर से आवाज आ रही थी कि इतने में हुसैन खान ने देखा कि दो व्यक्ति भागे चले जा रहे थे।

उनमें से एक व्यक्ति के हाथ में काला रंग का चमड़े का बैग था व दूसरे व्यक्ति के हाथ में चाकू… जो कि खून से सना हुआ था… मालूम पड़ता था कि किसी का वो खून करने के बाद बैग छिन कर भाग रहे हो… तभी हुसैन खान ने देखा कि एक व्यक्ति पेट पकड़े- पकड़े चीख रहा था…मेरे पैसे… मेरे पैसे… कोई पकड़ो उसे..कि उसी वक्त पुलिस गाड़ी सायरन बजाते हुए आने लगी तभी चाकू हाथ में लिया व्यक्ति एक पतली गली की तरफ भागा और बैग वाला व्यक्ति हुसैन की तरफ आने लगा। हुसैन भी थोड़ा डर सा गया था कि हिम्मत जुटाते हुए लंगड़ी लगा दी। लंगड़ी लगाते ही चोर  गिर पड़ा। उसके हाथ से वो काला बैग छूट कर दूर जा गिरा… चोर अपनी पुलिस से जान बचाने के लिए बैग लिये बिना ही भाग खड़ा हुआ फिर भी पुलिस उसी के पीछे लगी रही… शायद बैग गिरते पुलिस वालों ने देखा नहीं था। जब माहौल शान्त हो गया तो हुसैन खान वो बैग उठाकर देखने लगा… देखते ही उसकी आँखें फटी की फटी रह गई। उसने इतने पैसे अपने जीवन में एक साथ कभी नहीं देखे थे कि तभी पीछे से किसी की आने की आहट सुनाई दी… झट से उसने बैग को बंद कर छुपाने की कोशिश की… किन्तु उसकी छुपाने की कोशिश बेकार गई क्योंकि जिसका बैग था वो ठीक उसके पीछे खड़ा था। सकपका कर हुसैन बड़े बेमन से उसको बैग थामते हुए-

“लगता है… ये आपका बैग है…”

अजनबी का खून बहता देख हुसैन खान उससे कुछ पूछता कि वो वही जमीन पर गिर पड़ा और तड़पने लगा… इधर हुसैन के मन में बेईमानी का कीड़ा कुलबुलाने लगा इसलिए धीरे से बैग उठाते हुए उस अजनबी को वही छोड़कर आगे बढ़ने लगा तभी उसका दूसरा पैर जाम हो गया उसने देखा कि वो अजनबी अपनी पूरी ताकत से उसका पैर पकड़ा हुआ था और ऐसे देख रहा था…जैसे कह रहा हो…मुझे इस तरह से छोड़कर मत जाओ…

हुसैन खान उसकी आँखों की भाषा समझते हुए उससे कहा-



“मैं तुम्हें छोड़कर नहीं जा रहा हूँ…तुम्हारे लिए गाड़ी की व्यवस्था करने जा रहा हूँ ताकि तुम्हें अस्पताल पहुँचा सकूँ…”

उस अजनबी की आँखों में आँसू आ गए फिर इशारे से हुसैन को अपने पास बुलाते हुए-

“आप बहुत भले मानुष इंसान लगते हो…बस मेरा एक काम कर दीजिए…ये मेरा बैग मेरी पत्नी के पास पहुँचाना हैं क्योंकि चार दिन बाद मेरी बेटी की शादी हैं… नहीं तो उसकी बारात वापस चली जाएगी…”- अजनबी ने बड़ी मुश्किल से कहा।

“आप अपना पता बतायेंगे तभी तो मैं इस बैग को वहाँ पहुँचवा पाऊँगा…”- हुसैन ने अजनबी से कहा।

“मेरा नाम रतनलाल शर्मा है मेरी पत्नी का नाम सरोज शर्मा है और मेरे घर का प..पता ला…लाजपत नगर… ए-17/67….”-कहते- कहते रतनलाल की गर्दन · एक तरफ लुढ़क गई।

हुसैन खान सकते में आते हुए सोचने लगा कि ‘अब मैं क्या करूँ? पुलिस को फोन करूँ या इसे यहीं छोड़ पैसे से भरा बैग लेकर चला जाऊं…’ हुसैन कभी बैग की तरफ देखता तो कभी रतनलाल के मृत शरीर की तरफ… कुछ समय यूँ ही सोचने के पश्चात अचानक अपनी आँखों में नई चमक लाते हुए… बैग को उठाया और एक दिशा की तरफ भाग खड़ा हुआ। कुछ ही समय पश्चात वो वापस लौटा उसके साथ पुलिस थी किन्तु बैग नदारद था। पुलिस वहाँ से लाश को उठाकर ले गई लेकिन साथ में हुसैन खान को भी जाना पड़ा।

इधर रतनलाल के घर में कोहराम मचा हुआ था लेकिन रतनलाल के लिए नहीं क्योंकि उसके बारे में तो कुछ पता ही नहीं था अपितु शादी के कारण… इसलिए कि दो दिन बीत चुके थे और अभी तक रतनलाल जी अपने पी. एफ के पैसे लेकर नहीं आये थे। सभी लोग चिन्ता में हाथ पर हाथ धरे बैठे थे… आखिर बिना पैसे के शादी की तैयारी कैसे हो… अब कितने दिन रह ही गये थे… मात्र दो दिन…इन दो दिनों में उन्हें न जाने कितनी तैयारियाँ करनी थी…मिठाई वाले को… होटल वाले को… ब्यूटी पार्लर को… ज्वेलर्स वाले को… और तो और कुछ खरीदारियाँ अभी बाकी रह गई थी… ये सभी काम… तभी होते…जब रतनलाल जी पैसे लाते… जो अभी तक लेकर नहीं आये थे और अगले दिन ही बारात आनी थी…रिश्तेदार भी आने लगे थे। ज्यूँ-ज्यूँ समय बीत रहा था त्यों-त्यों सरोज का दिल बैठा जा रहा था।

तभी मोबाइल फोन की घंटी बज उठी…सरोज ने घबरा कर मोबाइल उठाया और घबराते हुए-

“हैलो…”

“क्या आप रतनलाल जी के घर से बोल रही हैं…?”- उधर से एक अपरिचित आवाज सुनाई पड़ी।

“ज… जी”- सरोज काँपते हुए।

“आप जितनी जल्दी हो सके…लाजपत नगर पुलिस थाना आ जाइये…”-कुछ समय पश्चात उधर से अपरिचित की आवाज आनी बंद हो गई थी।

सरोज काफी समय तक सुन की हालत में…मोबाइल यूँ ही कान में लगाये…लगाये खड़ी रही… फिर अकस्मात सरोज बिना किसी को बताये घर से निकल पड़ी।

पुलिस थाना पहुँचने पर- “सर… क्या बात है?…क्यूँ आपने मुझे यहाँ बुलाया…”- सरोज आने वाले तूफान से अनभिज्ञ थी।

“आप को एक लाश की शिनाख्त करनी होगी…”- इंस्पेक्टर ने एक लाश की तरफ इशारा करते हुए।

जैसे ही सरोज ने उस लाश की तरफ देखा वैसे ही वो चक्कर खा कर गिर गई क्योंकि सामने ही रतनलाल का मृत शरीर पड़ा हुआ था। दो दिन पहले की लाश होने के कारण थोड़ी- थोड़ी बदबू आने लगी थी….काफी देर बाद सरोज को होश आया तब जाकर इंस्पेक्टर ने भारी मन से कहा-

“मुझे अफसोस है सरोज जी…आप एक- दो दिन में लाश की सारी फॉर्मलटीज़ होने के बाद ले जा सकती  हैं…”

“इंस्पेक्टर साहब… इनके पास से कुछ… मिला है…?”- सरोज ने पूछा

“क्यों… नहीं…”- इंस्पेक्टर ने कहा।

सरोज आगे कुछ न बोली क्योंकि बे फिजूल किसी लफड़े में नहीं पड़ना चाहती थी…शादी का घर ऊपर से बकायेदारों का आये दिन तमाशा।

सरोज पुलिस थाने से निकल गई परन्तु आँसू थे कि रुकने का नाम नहीं ले रहे थे…आखिर रुके भी कैसे.. उसका सिन्दूर… उसका ज़िन्दगी भर का सहारा…उसका सब कुछ तो खत्म हो चुका था…रह गई थी तो वीरान ज़िन्दगी…अब सरोज के आगे कई विकट समस्या आ खड़ी हुई…एक थी… रतनलाल की मौत का सच…जो कि किसी भी हाल में इस सच को लड़की की विदाई तक छुपाना था…नहीं तो बकायेदारों का हंगामा खड़ा हो जाएगा और हो सकता है कि शादी में भी अड़चन आ जाए…दूसरी विकट समस्या थी…पैसा…जो सरोज के पास था नहीं…अब बिना पैसे के शादी कैसे हो…इन्हीं बातों को लेकर वो रोये जा रही थी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि पैसा कहाँ से लाए क्योंकि बकायेदारों ने और बकाया देने से इन्कार कर दिया था। यही सब सोचते-सोचते कब वो घर पहुँच गई उसे पता ही नहीं चला… तभी उसकी बेटी की आवाज उसके कानों में पड़ी-

“माँ… आप रो रही हैं… क्या बात है?…आप कहाँ गई थी?…वो भी इतनी रात को…”

“कल…तुम मुझे छोड़ के जो जा रही हो…”- माँ ने टालते हुए अपने कमरे में चली गई।

उधर बेटी मेहमानों की आवभगत में लग गई…इधर सरोज अपनी परेशानी से उबर नहीं पा रही थी और रह- रह कर उसे अब एक ही रास्ता दिखाई देने लगा…आत्महत्या का…उसके मन मस्तिष्क कुन्ध हो गए… सारी सोचने समझने की शक्ति खत्म हो गई…और आत्महत्या की पूरी योजना बना डाली…

तभी बेटी ने कमरे का दरवाजा खटखटाया- “माँ…कोई आप से मिलना चाहता है… वो कह रहे हैं कि केवल आप से ही मिलेंगे…”

बेटी ने कोई आहट न होते देख फिर दरवाजा खटखटाया-

“माँ…वो पापा का संदेशा लाये हैं… जल्दी आओ…”

तभी धीरे से कमरे का दरवाजा खुला…सरोज बाहर निकल कर सीधे ड्रॉइंग रूम में जा पहुँची… वहाँ जाकर देखती है कि एक व्यक्ति.. उसकी उम्र लगभग तीस साल की होगी…दुबला पतला.. मैला-कुचैला कपड़ा पहना खड़ा था…ऐसा लग रहा था जैसे कई दिनों से नहाया व खाया न हो। सरोज के पहुँचते ही-

“क्या आप ही सरोज जी है…?”-उत्सुकता से

सरोज ने बिना कोई उत्तर दिए पहले अन्दर से दरवाजा बंद कर दिया फिर उस अजनबी की तरफ मुखातिब होते हुए-

“हाँ… कहिये…आप क्या कहना चाहते थे मेरे पति के बारे में…”

“जी… मेरा नाम हुसैन खान है…मैं एक मुसलमान हूँ…मुझे अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है कि अब रतनलाल जी इस दुनिया में नहीं रहे…उन्होंने मरने से पहले मुझे एक जिम्मेदारी सौंपी थी…किन्तु समय पर मैं वो जिम्मेदारी निभा नहीं पाया क्योंकि मेरा मुसलमान होना यहाँ की पुलिस का पोख्ता सबूत था कि मैंने ही रतनलाल जी को मारा है…जबकि मैं तो उनको बचाना चाहता था… परन्तु वहाँ मुसलमान की सुनता कौन…आज भला हो उस इंस्पेक्टर का…जो हिन्दू होते हुए भी उसको मेरी बातों में…मेरी आँखों में सच्चाई देखी और उन्होंने मुझे छोड़ दिया…तब कहीं जाकर मैं आज यहाँ पहुँच पाया हूँ” – रुंधे गले से हुसैन कहते हुए अपने कमर से एक भारीभरकम कपड़े का बंडल निकाल कर टेबल पर रख दिया।

“ये क्या है…? और कैसी जिम्मेदारी…?”- सरोज ने आश्चर्य से उस बंडल को देखते हुए।

हुसैन ने उस बंडल के अन्दर से वो सारे पैसे निकालते हुए जो रतनलाल ने बैग में दिए थे। सरोज उन पैसे को आश्चर्य से देखते हुए…दोनों हाथ जोड़… दोनों आँखों से अश्रुधारा बहाने लगी…एक सच्चे मुसलमान के लिए…क्योंकि उसने एक नहीं… बल्कि कई जिंदगियां बचाई थी…।

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