Amma… | अम्मा…

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कहानी पढ़े:

अम्मा…अम्मा…मैं… पहचाना

कौन ?…

अंकुर…आपकी छोटी बेटी मीना का बेटा ….अंकुर ने कहाँ

कौन अंकुर …अम्मा थोड़ा सोचते हुए अपनी स्मृति पटल पर जोर डालते हुए।

ओह…अंकुर…कैसा है ? कब आया ?

अभी-अभी ..अम्मा अब यही रहकर आगे की पढ़ाई करने आया हूं । मम्मी ने आपके लिए मोतीचूर के लड्डू, मठरी, पेड़ा, ये सभी सामान अपने हाथों से बनाकर भेजी है क्योंकि आपको उनके हाथों की ये सभी चीज़ें बहुत पसंद है न । अंकुर एक-एक कर के डब्बे निकालते हुए आपने ही धुन में बोला जा रहा था, उसे इसका जरा भी इल्म नहीं था कि मामी (आशा) कब से दरवाजे पर खड़ी उन दोनों की बातें सुन रही थी । जब आशा से रहा नहीं गया तो बोल पड़ी – तुम्हारी माँ ने केवल अपनी माँ के लिए ही भेजी है कि कुछ अपनी भाभी के लिए भी।

क्यों नहीं मामी.. आपके लिए भी है- अंकुर एक डब्बा मामी को थामते हुए सभी की खैरियत पूछने वहाँ  से चला गया।



अंकुर के जाते ही आशा अपने डब्बे के साथ-साथ वह सारे डब्बे उठा लेती है, जो अंकुर लाया था ये कहते हुए कि “अब आप क्या करेंगी खाकर दाँत तो है नहीं” – आशा मुँह बिचकाते हुए वहाँ से डब्बे लेकर चली जाती है।

सच पूछा जाए तो बुढ़ापा बचपन का दुबारा आगमन है। अम्मा भी कोई बच्चे से कम नहीं थी। तरह-तरह के व्यंजन खाने का शौक बहुत था। दाँत न होने पर भी वह अपने शौक को कम नहीं करती थी, चाहे चुरकर,  भिगोकर जैसे भी खायें पर खाती जरूर थी या यूँ कह ले कि अम्मा की कोई कमजोरी थी तो केवल नये-नये व्यंजनों की। उसके अलावा वो किसी बात पर विशेष ध्यान नहीं देती थी, किन्तु घरवाले किसी कारणवश या उनकी इच्छा के प्रतिकूल करते अथवा भोजन का समय टल जाता तो घर वालो को एक सुर में आवाज लगाने लगती थी और ऐसे विलाप करने लगती जो साधारण न था।

अम्मा का यही एक अंग (जीभ) सबसे तेज काम कर रहा था, बाकी सभी अंग जैसे- आँख, कान, पैर-हाथ, शरीर की सभी हड्डियां शिथिल पड़ गई थी। वो अब चल भी नहीं पाती थी। बस जमीन पर ही उसका बिस्तर लगा था, घसीट-घसीट कर वो थोड़ा-बहुत अपनी दिनचर्या कर लेती वरना भगवान भरोसे।

उनके पति का स्वर्गवास हुए काफी समय बीत गया था। एक मात्र बेटा (रवि) था, जिसके नाम पर उन्होंने अपनी सारी सम्पत्ति लिख दी थी। बेटे-बहु को जब सम्पत्ति लेनी थी तब खूब लम्बे चौड़े ख्वाब दिखाये गए व् खूब उनकी सेवा-चाकरी होती किन्तु जैसे ही सम्पत्ति बेटे के नाम तबदील हुई, वैसे ही बेटे ने गिरगिट की तरह रंग बदल लिया। अब अम्मा को पेट भर कर एक समय भोजन भी नहीं मिलता, जबकि उसकी सम्पत्ति की वार्षिक आय लगभग लाखों में थी अगर वो अपनी आय को ज़िन्दगी भर  दोनों हाथों से भी लुटाती तो भी खत्म नहीं होने वाली थी। ऐसी स्थिति में बेटा रवि का दोष था अथवा उसकी पत्नी (आशा) का ये कहना मुश्किल था। रवि स्वभाव से तेज-तर्रार, चालाक, घुन्ने किस्म का व्यक्ति था परंतु ईश्वर से थोड़ा डरता था। उलटा पत्नी आशा स्वभाव में अपने पति से दो कदम आगे ही थी। उसको न तो समाज से और न ही भगवान से डर था।

ऐसी स्थिति में जब माता-पिता का यह रंग देखते तो बच्चे अम्मा को तंग करने का कोई अवसर नहीं छोड़ते थे, कोई बच्चे उनके कपड़े खिंच देता तो कोई उनपर जूठा पानी गिरा देता। ऐसे में अम्मा चीखती-चिल्लाती परंतु यह बात विख्यात थी कि अम्मा केवल खाने के लिए ही चीखती-चिल्लाती है अतएव कोई भी उनकी बात पर ध्यान नहीं देता।

पूरे परिवार में यदि अम्मा से कोई प्यार करता था तो रवि का सबसे छोटा बेटा ‘बाबु’ जो कि मात्र आठ साल का था। वही कभी-कभार अपने हिस्से का मीठा या कोई व्यंजन.. अम्मा को छिपाकर दे दिया करता। अकसर अपने माँ-बाप का अम्मा के प्रति ऐसा व्यवहार देखकर उसका बाल मन समझ तो गया ही था,कि अम्मा को सभी के सामने खाने का कोई भी सामान नहीं दिया जा सकता।

आज सुबह से ही खटपट की आवाज रसोईघर से आ रही थी, जैसे-कई तरह के पकवान बन रहे हो, किन्तु अम्मा को समझ नहीं आ रहा था,कि आखिर आज है क्या? पूरे घर में एक अजीब सा शोर हो रखा था। रवि भर-भर के थैले -साग-सब्जी ,फल, मीठा  ला रहा था,तो बाहर के कुछ लोग पूरे घर को करीने से सजाने में लगे थे तो कोई गार्डन को फूलमाला व् झालर से सजा रहे थे।

जो भी अम्मा के पास से गुजरता उनसे अम्मा पूछना न भूलती – “बेटा आज क्या है?” सभी बिना उत्तर दिये निकल जाते। इतने में ही दौड़ता हुआ बाबु आया, तब जाकर अम्मा को पता चला कि रवि की तरक्की होने की ख़ुशी में आज रात घर में पार्टी है।

अब मारे खुशी के अम्मा फूली नहीं समा रही थी, वो इसलिए नहीं कि बेटे की तरक्की हुई है बल्कि इसलिए कि आज उसे खूब बढ़िया-बढ़िया खाने को पकवान मिलेंगे – लाल-लाल, फूली-फूली पूड़ी होगी, भरवा कचौड़ी होगी, बून्दी का रायता होगा, कई तरह की सब्जी होगी और तो और मिठाइयां तो अनगिनत होगी। सोचते-सोचते अम्मा के मुंह में पानी आने लगा।

घी और मसालों की सुगंध रह-रहकर मन को आपे से बाहर किए दे रही थी। मन व्याकुल हुआ जा रहा था। भूख से अम्मा बेचैन होने लगी। अम्मा सोचने लगी, कि आवाज दूंगी, तो इतने शोर-शराबे में किसी को सुनाई नहीं देगा, क्यूँ न मैं ही धीरे-धीरे करके रसोईघर में पहुँच जाऊँ। यही सोचते हुए दोनों हाथों के बल से सरकते-सरकते रसोईघर में पहुँच गई। आशा अम्मा को देखते ही चीख पड़ी- “इतनी क्या भूख लगी थी, कि यहाँ चली आई। देखती नहीं कितना काम पड़ा है, बस आपको तो खाने से मतलब है।”

“बहू …बड़ी भूख लगी है। सुबह से कुछ नहीं खाया है, अब तो शाम होने को आ गई” – अम्मा का गला कहते-कहते रुद्ध गया।

“तो मैंने कौन सा खा लिया, आपके ही बेटे के लिए कर रही हूँ। समझना चाहिए कि आज घर में पार्टी है, कितना काम है खाने में देर-सबेर तो हो ही जाती है। जाइए अपने कमरे में”- आशा झल्लाते हुए । बस इनको तो सारा दिन खाना देते रहो, पता नहीं इस बुढ़िया का पेट है की क्या? भरने का नाम ही नहीं लेता (बड़बड़ाते हुए)।

इधर वापस अपने कमरे में आकर मन मसोसकर बिस्तर पर लेट जाती है और अपने आप पर झल्लाने लगती है, कि खा-मो-खा मैं क्यूँ गई, क्या जरूरत थी जाने की? क्या मैं खाये बिना मरी जा रही थी? मैंने बेवजह बहू को नाराज़ कर दिया। अब वो मुझे गुस्से में पार्टी का खाना देगी भी या नहीं। पता नहीं रवि को मेरे बारे में क्या-क्या सिखायेगी । नहीं- नहीं ऐसा नहीं हो सकता, मैं तो इस घर की सबसे बड़ी सदस्य हूँ न, मुझे खिलाये बिना कैसे बहू-बेटा का दिल मान सकता है। बहू एक बार भूल भी जाए, किन्तु रवि तो मेरा अपना बेटा है, मेरा खून है वो तो हरगिज नहीं भूलेगा। आखिर में, मैं उसकी अपनी माँ हूँ-अपने ही उधेड़-बुन में अम्मा का वक़्त बीतता गया।

शाम के छः बज चूके थे। गार्डन चारों तरफ से सजा हुआ था। दोनों तरफ टेबल लगी थी। वो सफ़ेद कपड़ों से ढ़की थी। उनके ऊपर तरह- तरह के व्यंजन लगे थे, एक तरफ चाट के स्टॉल – गोलगप्पे, चाउमीन, टिक्की, पनीर चिल्ला, टमाटर-चाट, चूड़ा-मटर लगे थे। दूसरी तरफ पानी की व्यवस्था थी। धीरे-धीरे लोगों का आना शुरू हो गया था। देखते ही देखते मेहमानों से पूरा गार्डन भर गया था। धीमे – धीमे गाने की धुनें बज रही थी। ये सारा ही नजारा बड़ा मनमोहक हो रखा था किन्तु इधर अम्मा अपनी बेबसी पर रो रही थी और अपने बीते समय को याद करने लगी।

रवि की शादी का समय था। इतने लोग शादी में आये थे, मानो पूरा गाँव ही उमड़ पड़ा हो। ये तो वैध जी (रवि के बापू) का ऐसा  व्यवहार था, कि वो पलभर में पराये को भी अपना बना लेते थे। पूरा गाँव ही वैध जी से दवाइयां लेने आता था, किन्तु वैध जी किसी से भी पैसा न लेते, वो ये कहकर पैसा लेने से इनकार कर देते कि “भगवान का दिया मेरे पास बहुत कुछ है।” उनके माता-पिता की जमीन-जायदाद बहुत थी। ये अपने माँ-बाप की इकलौती संतान थी। साथ ही वैध जी अपने माँ-बाप की भगवान की तरह सेवा दिल लगा के करते। सभी लोग गाँव के यही कहते , कि बेटा हो तो वैधजी जैसा। इसलिए पूरा गाँव वैध जी को बहुत मानता था । अगर आधी रात में भी वैध जी के घर पर कोई आफत आ जाती तो पूरा गाँव की गाँव चला आता  जैसे उनके घर पर आन पड़ी हो। इतना गाँव वालों का प्यार देख अम्मा अपने भाग्य पर इठलाने लगती थी। अम्मा को अच्छी तरह से याद है ,कि जब रवि की शादी थी तो उसको इतना काम था, कि अपने खाने का होश ही नहीं रहता था। ये तो वैध जी की मेहरबानी थी कि वो मुझे किसी न किसी बहाने खिला दिया करते थे, ये कहते हुए कि ‘जान है तो जहान है।‘ पर ये नहीं था कि केवल अपनी पत्नी को ही पूछते थे,अपनी पत्नी से पहले अपने माता – पिता को पूछना नहीं भूलते थे। रवि की शादी के कुछ दिनों के बाद ही ‘जो इस दुनिया में जन्म लेता है उसे एक न एक दिन जाना ही पड़ता है’ इसी सत्यता के साथ वैध जी के माता – पिता का देहांत हो गया। अब वैध जी का मन किसी काम में नहीं लगता था । अकसर वो अपने माता – पिता को याद करते- करते रोने लगते। वैध जी इस सदमे को ज्यादा दिन झेल नहीं पाये और एक दिन वो भी चल बसे । इसी के साथ अम्मा की मांग के साथ- साथ दुनिया भी उजड़ गई थी।

सहसा ही अम्मा का हाथ अपने गालों पर गया, ये क्या? आँसुओ से गाल भरा था। अपने निर्बल- निर्बल हाथों से गाल पोंछते हुए ।

ओह…बहुत देर हो गई। सुबह से ही किसी ने खाना नहीं दिया । भूख के कारण अम्मा का पेट मरोड़ने लगा था। इतनी भी हिम्मत नहीं थी कि अम्मा अब किसी को आवाज़ लगा सके। किसी तरह धीरे-धीरे खिसकते हुए बाहर जाकर देखती क्या है? कि पूरे घर में सन्नाटा छाया हुआ था और गार्डन में बहुत सारे कुत्ते झूठे प्लेटों को चाट रहे थे।

अब अम्मा की हिम्मत छूट चुकी थी मानो वैध जी अम्मा को कह रहे हो- “अब तुम्हारी यहाँ पर किसी को जरूरत नहीं है ।चलो…मेरे साथ चलो…।

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